इस बार चर्चा का विषय है कि साइबर कानून का किस तरह से उल्लंघन हो सकता है और उसके क्या उपाय हैं।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट, "'बकबक' पर पॉडकास्ट कैसे सुने" देखें।
दूसरा, अन्य क्षेत्र में उल्लघंन: यह उल्लघंन मुख्य रूप से सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लघंन है। इसे सामान्य भाषा में साइबर अपराध (Cyber crime) कहा जाता है।
सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम में साइबर अपराध के लिए दो तरह के उपाय दिए गये है।
पहला, दीवानी उपाय (Civil relief): इसमें जो भी व्यक्ति आपको नुकसान पहुँचाता है उससे आप हर्जाना प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह मुकदमे सिविल न्यायालयों में नही चलते। इन मुकदमे को तय करने के लिए एक अलग से अधिकारी (Adjudicating Officer) नियुक्त किया जाता है। इस समय प्रत्येक राज्य में उनके इंफॉरमेशन तकनीक के सक्रेटरी ही यह अधिकारी है। इनके फैसले की अपील साइबर ट्रियूब्नल मे होती है। उसके बाद इनकी अपील हाई कोर्ट में दाखिल की जा सकती है।
दूसरा फौजदारी अभियोग (Criminal Prosecution): इसमें साइबर कानून के उल्लघंन करने वालो को सजा हो सकती है। इसके लिए पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करानी पड़ती है और मुकदमा फौजदारी अदालत में ही चलता है।
अगली बार हम लोग साइबर अपराधों के बारे में चर्चा करेंगे।
सूचना प्रौद्योगिकी के कारण कानून के हर क्षेत्र में मुश्किले आयीं। इस बार चर्चा का विषय है कि उनको दूर करने के लिये, अपने देश में किस प्रकार के और किस क्षेत्र में कानून बनाये गये।
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हमारी संसद जहां यह कानून बनाये गये चित्र विकिपीडिया से
इस नयी तकनीक के कारण पैदा हुई मुशकलों का हल निकालने के लिये सबसे पहले अपने देश में कानून में बदलाव, बौद्धिक सम्पदा अधिकार के क्षेत्र में किया गया।
कॉपीराइट अधिनियम को १९९४ एवं १९९९ में संशोधित कर, इस तकनीक के द्वारा लायी गयी और मुश्किलों को दूर किया गया।
२००२ में, पेटेंट अधिनियम में भी संशोधन किया गया। इस बारे में आप यहां विस्तार से पढ़ सकते हैं।
२००४ में एक अध्यादेश के द्वारा, पेटेंट अधिनियम में किये गये संशोधन को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया। लेकिन जब यह अध्यादेश, २००५ में अधिनियम के रूप में लाया गया तब इस स्पष्टीकरण को अधिनियम में नहीं जोड़ा गया। इसका अर्थ यह हुआ कि पेटेंट अधिनियम में, २००२ में किया गया संशोधन ही लागू है।
इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण अधिनियम २००० में, सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम (Information Technology Act) (आईटी अधिनियम) के नाम से बनाया गया। इस नियम के अन्तर्गत चार अधिनियमों में भी संशोधन कया गया। यह चार हैं
The Indian Penal Code, 1860;
The Indian Evidence Act, 1872;
The Bankers’ Book Evidence Act, 1891;
The Reserve Bank of India Act, 1934.
इस समय तीन तकनीकियां - इंटरनेट, टेलीफ़ोन, और टेलीविजन आपस में मिलते जा रहे हैं। वह समय दूर नहीं है जब तीनो मिल जायेगें। इस तकनीकियों के फायदों का ठीक प्रकार से लाभ उठाने के लिए, एक अधिनियम बनाने की बात सोची गयी। इस का नाम Communication of Convergence Bill है। यह बिल संसद समिति के सामने भेज दिया गया था। समिति ने, हर क्षेत्र के लोगों से अलग अलग बात करने के बाद यह पाया कि इसको बनाने के बारे में विरोधाभास है।
एक विचारधारा के लोग यह कहते थे कि सरकार को यह अधिनियम नहीं बनाना चाहिए;
दूसरी विचारधारा के लोगों का कहना था कि इसे बनाना चाहिए।
इन दोनों विचारधाराओं को बताते हुए, समिति ने अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में लिखे विरोधाभास के कारण, यह बिल अभी भी अधिनियम के रूप में नहीं बन पाया।
कम्यूनिकेशन कंर्वजन बिल अधिनियम के रूप में तो नहीं बन पाया। लेकिन इसमें बहुत सारे ऎसे प्राविधान थे जो कि वास्तव में बेहतरीन थे।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में २००८ में संशोधन किया गया और कम्यूनिकेशन कंर्वजेन्स बिल के कई प्रावधानों को, संशोधन के द्वारा इसमे सम्मिलित कर लिया गया है। हांलाकि इस संशोधन के बाद भी, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम सारी कमियां दूर नहीं हुई है। बहुत कुछ करना बाकी है। देखिय वह कब तक हो पाता है।
साइबर कानून का किस तरह से उल्लंघन हो सकता है इसकी चर्चा अगली बार।
इस चिट्ठी में, बताया गया है कि साइबर कानून क्या होता है। इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट, "'बकबक' पर मेरे पॉडकास्ट कैसे सुने" देखें।
धर्म न्यायधिकरण के सामने गैलिलिओ - चित्र क्रिस्टो बान्टी १८५७
विज्ञान के आविष्कार, नयी तकनीकें जहां विज्ञान को आगे ले जाते हैं वहीं पर कानून के लिए हमेशा अड़चने पैदा करते हैं।
गैलिलियो ने इस बात का सबूत दिया कि सूरज, पृथ्वी के चारो तरफ नहीं, ब्लकि पृथ्वी और अन्य ग्रह, सूरज के चारो तरफ चक्कर लगाते हैं। इसलिए उसे नजरबंद कर दिया गया।
जब डार्विन ने ओरिजन आफ स्पीशीस् (Origin of Species) लिखी तब अधिकतर ईसाई देशों में इसके पढ़ने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस समय अमेरिकी न्यायालयों से एक बहुत बड़ी बहस इस बात पर चल रहा है कि कि ओरिज़न आफ स्पीशीस के साथ एक अन्य तथा कथित सिद्घान्त इंटेलीजेन्ट डिज़ाइन (Intelligent design) जो कि धार्मिक है को पढ़ाया जाए अथवा नहीं। कुछ समय पहले, डार्विन के २००वें जन्मदिन पर मैंने एक श्रृंखला लिखी थी। इसकी आखरी कड़ी यहां है। इस पर बाकी सारी कड़ियों की लिंक है। जहां सारे विवाद की चर्चा है।
सूचना प्रौद्योगिकी एक नयी तकनीक है। इसका जन्म तीन कारणों से हुआ
कंप्यूटर: इसके बारे में तो हम सब जानते ही हैं कुछ और कहना तो ठीक नहीं होगा।
इंटरनेट: यह तो आप जानते हैं कि कंप्यूटर आपस में संवाद कर सकते हैं। इंटरनेट दुनिया के सारे कंप्यूटरों का वह जाल है जो एक दूसरे से संवाद कर सकते हैं।
साइबर स्पेस: कंप्यूटर के द्वारा संवाद करते समय सूचनाओं का आदान प्रदान ईमेल, ऑडियो क्लिप, वीडियो क्लिप के जरिये होता है। सूचना का यह आदान प्रदान एक काल्पनिक जगह (Virtual space) में होता है। इसे साइबर स्पेस (Cyber Space) कहते हैं।
इन तीनो से मिल कर, सूचना प्रौद्योगिकी का जन्म हुआ।
इस तकनीक ने कानून के क्षेत्र में जितनी मुश्किलें पैदा की वह अन्य किसी आविष्कार या तकनीक ने नहीं। इन मुश्किलों के अलग अलग हल ढूंढे जा रहे है। देश कानून बना रहे हैं। सरकारें नियम व अधिनियम बना रही हैं। न्यायालय फैसले दे रही हैं। इन सारे समाधानों को मोटे तौर पर, कंप्यूटर कानून, या इंटेरनेट कानून या साइबर कानून कहा जाता है। मुझे साइबर कानून शब्द पसन्द है। इसलिये मैं इसी का प्रयोग करूंगा।
इस नयी तकनीक ने कौन कौन से क्षेत्र में मुशकलें पैदा की, या अपने देश में किस के साइबर कानून बने हैं, इसकी चर्चा अगली बार।
'बुलबुल मारने पर दोष लगता है' श्रृंखला, 'To Kill A Mockingbird' उपन्यास के बारे में थी। इस श्रृंखला में चर्चा थी कि यह उपन्यास क्यों लिखा गया , इसकी क्या कहानी थी, इसकी क्या शिक्षा है। इस चिट्ठी में चर्चा है कि इसका श्रृंखला के नाम का चयन कैसे हुआ।
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मेरी बिमारी के समय मेरे बेटे और बिटिया रानी ने कुछ पुस्तकें पढ़ने के लिये भिजवायीं थीं। इनमें से एक पुस्तक 'हू द हेल इज़ ओ ॑-हारा' (Who the Hell is O'Hara) है। इस पुस्तक में, दुनिया के ५० बेहतरीन लिखे उपन्यासों के बारे में लिखा है कि वे किस प्रकार से लिखे गये हैं। यह पुस्तक पढ़ने योग्य है।
इस पुस्तक में एक लेख 'टू किल अ मॉकिंगबर्ड' उपन्यास के बारे में था। इस उपन्यास को मैंने अपने बचपन में पढ़ा था तभी इस पर बनी फिल्म भी देखी थी। इसी को पढ़ते समय मुझे इस श्रृंखला को लिखने का विचार आया और इसकी रूप रेख बनायी। फिर सवाल उठा कि इस श्रृंखला का क्या नाम रखा जाय।
इस उपन्यास में एक वाक्य है।
'It is sin to kill a mockingbird'
मुझे लगा कि इस श्रृंखला का यही नाम होना चाहिये। अब सवाल उठा कि इसका उचित हिन्दी अनुवाद क्या होगा।
मॉकिंगबर्ड एक छोटी सी चिड़िया होती है। यह मुधर आवाज़ के लिये जानी जाती है। यह केवल अमेरिका में पायी जाती है। इसलिये इसका हिन्दीं में कोई नाम नहीं है। शास्त्री जी ने अनुवाद नहीं सुझाया पर कहा,
'Mockingbird is a harmless bird, but since it tends to sing after midnight, many are irritated and kill it. I have not seen a Hindi equivalent. Any saying that says we should not kill the innocent due to our personal annoyance will do. I have not come across any Hindi saying for that.'
मॉकिंगबर्ड निर्दोष चिड़िया होती है। यह आधी रात के बाद गाती है इसलिये लोग खिजाते हैं और मारते हैं। मुझे इसके बारे में हिन्दी में कहावत नजर नहीं आयी। लेकिन कोई भी कहावत जो यह कहती हो कि निर्दोष को मारना गलत है ठीक होगी।
सोन चिरैया या Indian bustard एक बड़ी चिड़िया है और अपनी सुंदरता के लिये जानी जाती है अपनी मधुर आवाज़ या गाने के लिये नहीं। यह लुप्त हो रही है यदि हमने इसे रोका नहीं तो यह हमेशा के लिये गायब हो जायगी।
मुझे सुनने में यह शीर्षक अच्छा लगा। लेकिन इस उपन्यास में मॉकिंगबर्ड गाने वाली छोटी चिड़िया है और निर्दोषता का प्रतीक है। मैं किसी छोटी गाने वाली चिड़िया का ही नाम रखना चाहता था। मेरे परिवार वालों ने कोयल, मैना, शमा नाम सुझाया पर मुझे में बुलबुल नाम ठीक लगा।
बुलबुल एक छोटी गाने वाली चिड़िया है जो निर्दोष है और अपने देश में जानी जाती है। इसकी प्यारी आवाज यहां सुन सकते हैं। यह मेरे घर में बहुत आती है। अब सवाल उठा कि शीर्षक क्या होना चाहिये।
अन्त में मुझे अरविन्द जी का शीर्षक ही पसन्द आया। बस सोन चिरैया की जगह बुलबुल कर दिया और 'को' शब्द गायब कर दिया - मिल गया इस श्रंखला का शीर्षक, 'बुलबुल मारने पर दोष लगता है'।
अभी कुछ कम समझ में आ रहा है और समय की भी कमी लगती है। देखिये कब कोई नयी श्रृंखला शुरू कर पाता हूं।
इस श्रृंखला की पिछली कड़ियां नीचे चटका लगा कर पढ़ें। यदि उस कड़ी को सुनना चाहें तब उस कड़ी के आगे लगे ► चिन्ह पर चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट, 'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने' देखें।
‘टु किल अ मॉकिंग बर्ड’ उपन्यास में, जीवन के दर्शन को कुछ सरल भाषा में बताया गया है। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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‘टु किल अ मॉकिंग बर्ड’ में ऎटिक्स स्कॉउट को समझाते हैं कि,
'Scout, if you can learn a simple trick, you'll get on better with all kinds of folks. You never really understand a person until you consider things from his point of view.....Until you climb into his skin and walk about in it.' जब तक आप दूसरे की नजर से नहीं देखोगे तब तक उसे समझ नही सकते।
एक जगह जब एटिक्स, स्कॉउट से पूछते हैं कि क्या वह चाहेगी कि उसकी बुआ वहां उन के साथ रहें तब स्कॉउट जवाब देती है,
'I said I would like it very much—a lie, but one must lie under certain circumstances when one can't do anything about them' मैंने कहा कि मैं अवश्य चाहूंगी कि बुआ हमारे साथ रहें। यह बात एकदम झूट थी लेकिन किसी को उन परिस्थतियों में झूट बोलना चाहिए जब वह उसके बारे में कुछ न कर सके।
जब अश्वेत व्यक्ति के मुकदमे में वकील हो जाने के बाद सब लोग एटिक्स और उसके बच्चों से बात करना बंद कर देतें हैं। तब ऎटिक्स अपने बच्चों को समझाते हैं,
'Because I couldn't Scout, every lawyer gets at least one case in his lifetime that affects him personally. This one's mine, I guess. You might hear some ugly talk about it at school, but do one thing for me: no matter what anybody says to you, you just hold your head high and keep those fists down.' मै इस मुकदमें को लेने से नही मना कर सकता था। प्रत्येक वकील के जीवन में कम से कम एक मुकदमा आता है जो उसे व्यक्तिगत तौर पर असर करता है। यह मेरे लिए वैसा ही मुकदमा है। हो सकता है कि इसके बारे में, तुम कुछ भद्दी बातें स्कूल में सुनो पर ख्याल रखना कोई भी कुछ कहे अपना सर उठा कर चलना।
ऎटिक्स अश्वेत लड़की के पिता से जिरह के दौरान दस्तखत करने को कहता है सबको आश्चर्य होता है पर स्काउट को मालूम था कि उसके पिता ऎसा क्यों कर रहे थे। यह वकील के जीवन का कटु सत्य भी है।
'Atticus seemed to know what he was doing ... but it seemed to me that he'd gone frog-sticking without a light. Never, never on cross- examination ask a witness a question you don't know the answer to, was a tenet I had absorbed with may baby food.' ऎटिक्स को मालूम था कि वह, क्या कर रहा था --- गवाह से जिरह करते समय कभी ऎसा सवाल न पूछो जिसका जवाब तुम्हें न मालूम हो।
श्वेत लड़की के दाहिनी तरफ चोट थी। इससे पता चला कि उसे किसी बायें हत्थे व्यक्ति ने मारा है। उस लड़की के पिता ने बायें हाथ से दस्तखत किये। जिससे पता चल गया कि उसका पिता बांया हत्था था जब कि अश्वेत का बांया हाथ खराब था। दाहिने हाथ से मुंह के दाहिने तरफ मार पाना बहुत मुश्किल है। ऎटिक्स दिखाना चाहता था कि श्वेत लड़की के पिता ने ही उसे मारा था।
बचपन के दिन भी क्या दिन थे। 'टु किल अ मॉकिंगबर्ड' फिल्म के एक दृश्य में जेम और स्कॉउट
एक अन्य जगह एटिक्स, स्कॉउट से कहते हैं,
'Most people are... nice ....when you finally see them.' जब हम लोगों का समझा पाते है तो पता चलता है कि अधिकतर लोग अच्छे होतें है।
इस उपन्यास में यह दर्शाया गया है कि निर्दोषता समाप्ति पर क्या होता है। मॉकिंगबर्ड छोटी गाने वाली चिड़िया होती है वे किसी का नुकसान नहीं करती। इस उपन्यास में, मॉकिंगबर्ड ही निर्दोषता के प्रतीक के रूप में बताया गया हैं।
स्काउट और उसका बड़ा भाई, बड़े दिन पर एयर राइफल चाहते थे और यह उन्हें मिलती है। लेकिन ऎटिक्स उनसे कहते हैं,
'I'd rather you shoot at tin cans in the back garden but I know you'll go after birds. Shoot all blue jays you want, if you can hit them, but remember it's sin to kill a mocking bird'. मुझे अच्छा लगेगा यदि तुम लोग बगीचे में टिन के डिब्बों पर निशाना लगाओ। पर तुम लोग चिड़ियों के पीछे जाओगे। तुम्हे जितनी ब्लूजे को मारना हो मारो, यदि तुम उन्हें मार सको। लेकिन याद रखना मॉकिंगबर्ड को मारने से पाप लगता है।
जब वे अपनी पड़ोसन से मॉकिंगबर्ड न मारने का कारण पूछतें है तब वह बताती है,
'Your father is right. Mockingbird don't do one thing but make music for us ... That's why it's a sin to kill a mockingbird'. तुम्हारे पिता ठीक कहते हैं। मॉकिंगबर्ड कोई नुकसान नहीं पहुंचाती लेकिन हमें संगीत सुनाती हैं। इसीलिये इन्हें मारने से पाप लगता है।
यहीं से इस उपन्यास का नाम लिया गया है।
इसी के साथ यह श्रंखला समाप्त होती है। बहुत जल्द, किसी नयी नयी श्रृंखला के साथ मुलाकात होगी। तब तक के लिये आप हिमाचल यात्रा का आनन्द लें।
स्कॉटस्बॉरो बॉयज़ ट्रायल में, ९ अश्वेत लोगों पर, श्वेत लड़कियों के साथ बलात्कार करने का मुकदमा ऍलाबामा राज्य में चला था। इस मुकदमे ने हार्पर ली पर असर डाला। उनके द्वारा लिखा उपन्यास, 'टु किल अ मॉकिंग बर्ड' इसी पर आधारित है। आज चर्चा करेंगे - इस उपन्यास की कहानी के बारे में और इसके एवं ली के वास्तविक जीवन में समन्वय को भी देखेंगे।
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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देखें।
ली, पुस्तक पर बनी फिल्म प्रॉड्यूसर के साथ - चित्र सौजन्य विकिपीडिया
हार्पर ली का जन्म २८ अप्रैल, १९२६ को ऍलाबामा राज्य में हुआ था। ऍलाबामा राज्य अमेरिका के दक्षिण में है उस समय दक्षिण और उत्तर अमेरिका में, अश्वेतों के बर्ताव में काफी अन्तर था। दक्षिण में नागरिक अधिकारों का उतना महत्व नहीं था। स्कॉटस्बॉरो बायॉज़ के मुकदमे के समय, ली छ: साल की थी। इस मुकदमे ने, उस के जीवन में बहुत कुछ असर डाला। 'टू किल अ मॉकिंगबर्ड' इसी अनुभवों के आधार पर लिखा उपन्यास है। यह कहानी १९३० के दशक की है। यह कहानी है एक बहन स्काउट, उसके भाई जेम और उनके मित्र डिल की।
स्काउट के पिता एटिक्स फिंच एक वकील हैं। बू रैडली उनके रहस्यमय पड़ोसी हैं। इसमें एक अश्वेत व्यक्ति पर एक श्वेत लड़की से बलात्कार का प्रयत्न करने के लिए मुकदमा चलता है। एटिक्स को बचाव पक्ष का अधिवक्ता नियुक्त किया जाता है। इस मुकदमे में यह सिद्ध हो जाता है कि अश्वेत व्यक्ति निर्दोष है और श्वेत लड़की को चोटें,उसके पिता ने ही पहुंचायी थी। फिर भी, अश्वेत व्यक्ति को सजा हो जाती है। इस मुकदमे के बाद श्वेत लड़की का पिता स्काउट और जेम को मारने का प्रयत्न करता है। उस समय बू रैडली जो कि अविवेकी के रूप में जाना जाता है उनकी जान बचाता है।
'टु किल अ मॉकिंगबर्ड' फिल्म में एटिक्स की भूमिका में ग्रेगरी पेक और स्कॉट की भूमिका में मैरी बैधम
बहुत से लोगों का कहना है कि 'टु किल अ मॉकिंगबर्ड' हर्पर ली की जीवनी है पर वे इस बात को तो नकारती है पर यह भी स्वीकारती हैं कि उन्होंने जीवन में जो भी देखा, उसी को इस कहानी में उतारा है।
लोगों का कहना भी गलत नहीं है क्योंकि वास्तविक जीवन में भी ली का बड़ा भाई और मित्र था। उसके पिता भी वकील थे और शादी के पहले उनकी माँ का नाम फिंच था जो कि उपन्यास में इनका सर-नाम है। उपन्यास से में ली का मित्र डिल है और वास्तविक जीवन में उनके मित्र का नाम ट्रूमैन कापाटे था।
उसका पहले नाम ट्रूमैन स्ट्रेकफस परसॉनस् (Truman Streckfus Persons) था। ट्रूमैन, जब चार साल का था तभी उनके माता-पिता में तलाक हो गया। उसकी मां हमेशा अच्छा जीवन जीने की सोचा करती थी। लेकिन तलाक से वह टूट गयी। उसने ट्रूमैन को उनकी आंटी के पास, मॉनरोविले में भेज दिया। वह ली को पड़ोसी था। वहीं उसका लालन पालन हुआ। 'टु किल अ मॉकिंगबर्ड' में भी डिल दूसरी जगह से आता है।
ट्रूमैन की मां न्यूयार्क चली गयी जहां उसने दूसरी शादी कर ली। बाद में ट्रूमैन के सौतेले पिता ने उसे गोद ले लिया जिससे उसका नाम बदलकर ट्रूमैन कापाते हो गया।
'टु किल अ मॉकिंग बर्ड' जीवन के दर्शन को कुछ सरल वाक्यों में बताती है। अगली बार मिलेंगे तब इसी के बारे में बात करेंगें।
मैंने पिछली बार बताया था कि ९ अश्वेत लोगों पर, दो श्वेत लड़कियों के साथ बलात्कार करने के लिये तीन बार अलग अलग मुकदमा चला था। पहली बार, यह ऐलाबामा के स्कॉटस्बॉरो शहर में चला था। इसलिये इस मुकदमें को स्कॉटस्बॉरो बॉयज़ ट्रायल के नाम से जाना जाता है। इन आरोपियों पर अलग अलग मुकदमा चला। आज चर्चा का विषय है कि इस मुकदमें में क्या फैसला हुआ।
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने'
देखें।
स्कॉटस्बॉरो बॉयज़ अपने वकील सैमुएल लाइबोविट्ज़ के साथ।
पहली बार एक को छोड़कर आठ को फांसी की सजा सुनाई गयी। एक लड़के को, इसलिए छोड़ दिया गया था क्योंकि उसकी आयु १२ साल थी। ऎलाबामा राज्य के सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय की पुष्टि कर दी लेकिन अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला पॉवेल बनाम ऎलाबामा (Powell Vs. Albama 287 US) में उलटते हुए कहा,
'A defendant should be afforded a fair opportunity to secure counsel of his own choice. Not only was that not done here, but such designation of counsel as was attempted was either so indefinite or so close upon the trial as to amount to a denial of effective and substantial aid in that regard.' आरोपी को अपनी पसन्द का वकील करने का पर्याप्त समय मिलना चाहिए। इस मुकदमे में ऎसा नहीं हुआ। न्यायालय ने जो वकील उन्हें दिया वह न केवल अनियमित था पर उसकी नियुक्ति मुकदमा शुरू होने के इतनी करीब थी कि आरोपियों को कोई भी ठोस एवं प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिल पायी।
रूबी बेटस्, दूसरी बार मुकदमा चलते समय, गवाही देते हुऐ।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से वापस आने के बाद यह मुकदमे अन्य शहर में स्थानान्तरित कर दिए गये। इसमें सबसे पहले पैटरसन पर मुकदमा चला और बचाव पक्ष की तरफ से सैमुएल लाइबोविट्ज़ वकील नियुक्त हुये। इस मुकदमे में रूबी बेटस् ने बचाव पक्ष की तरफ से गवाही दी। उसने कहा,
'अश्वेत लड़कों ने हमें नहीं छेड़ा था। मैंने पहली बार बलात्कार की बात विक्टोरिया प्राइस के कहने पर कही थी। क्योंकि विक्टोरिया ने कहा था कि यदि मैं इस तरह से नहीं कहूंगी तो हमें इस तरह (बिना टिकट, माल गाड़ी पर) राज्य की सीमा पार करने के लिए जेल में रखा जा सकता है।'
इस बार सबूत में यह बात सिद्घ हो चुकी थी कि पैटरसन दोषी नहीं है फिर भी जूरी ने उसे फांसी की सजा सुनाई। इसे परीक्षण न्यायधीश ने रद्द कर दिया। इसके बाद पैटरसन तथा बाकी सब पर पुन: मुकदमा चला। इस बार पुनः, एक को छोड़कर सबको फांसी की सजा हो गयी। ऎलाबामा सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। यह मुकदमा दुबारा फिर से अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा।
सर्वोच्च न्यायालय में, सैमुएल ने जूरी चयन को मुद्दा बनाया। इसने बहस कि,
'वहां एक भी अश्वेत व्यक्ति को जूरी सेवा के लिये नहीं बुलाया गया हालांकि वहां के अश्वेत लोग जूरी सेवा के लिये योग्य थे। जुरी चिट्ठे में जालसाज़ी कर, बाद में अश्वेत लोगों के नाम बढ़ाये गये हैं।'
जब अमेरिका सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने सैमुएल से पूछा,
'क्या तुम यह सिद्घ कर सकते हो?'
सैमुएल ने हांमी भरी और जुरी चिट्ठा को सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखा। जिससे पता चलता ता कि उसमें जालसाज़ी हुई है। यह अमेरिकी इतिहास में पहली, और केवल एक बार हुआ कि उन्होंने तथ्यों को अपनी अदालत में देखा। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने पुन: फैसले को रद्द करते समय (Norris Vs. Albama 294 US 587) कहा,
'Whenever by any action of State, whether through its legislature, through its courts, or through its executive or administrative officers, all persons of the African race are excluded, solely because of their race or color, from serving as grand jurors in the criminal prosecution of a person of the African race, the equal protection of the laws is denied to him, contrary to the Fourteenth Amendment of the Constitution of the United States.
We think that the evidence that for a generation or longer no negro had been called for service on any jury in Jackson County, that there were Negroes qualified for jury service, that according to the practice of the jury commission their names would normally appear on the preliminary list of male citizens of the requisite age but that no names of Negroes were placed on the jury roll, and the testimony with respect to the lack of appropriate consideration of the qualifications of negroes, established the discrimination which the Constitution forbids. The motion to quash the indictment upon that ground should have been granted.' जब अफ्रीकन मूल लोगों को उनके रंग या कुल के कारण अफ्रीकन मूल पर चल रहे मुकदमे में रखने से वंचित किया जाता है तो यह १४ वें संशोधन का उल्लंघन है। जब पीढ़ी दर पीढ़ी से किसी भी अश्वेत को न तो जूरी सेवा के लिए बुलाया जाए, न ही उनका नाम जूरी चिट्ठे पर हो जब कि वे इसके लिए उपयुक्त हों तब यह भेदभाव, संविधान के विरूद्व है और इस अभियोग को अपास्त करने के लिए पर्याप्त है।
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से वापस आने पर पाँच लोगों के खिलाफ मुकदमा समाप्त कर दिया गया। एक को फांसी की सजा दी गयी पर उसे गवर्नर ने आजीवन कारावास में बदल दिया। इस समय सब मानते है कि वे अश्वेत लड़के दोषी नहीं थे। उन्हें यह सजा गलत तरीके से दी गयी।
इस मुकदमे पर कई फिल्म और प्रलेखी बनी हैं। १९७६ में एनबीसी ने जज हॉरटन एण्ड द स्कॉटस्बॉरो बॉयज़ (Judge Horton and the Scottsboro Boys) नाम से टीवी फिल्म, १९९८ में कोर्ट टीवी (नया नाम ट्रूटीवी) ने इसी पर ग्रेटेस्ट ट्रायल ऑफऑल टाइमस् श्रंखला (Greatest Trials of All Time series) के लिये प्रलेखी, २००१ में स्कॉटस्बॉरो बॉयज़ ट्रायल (Scottsboro: An American Tragedy) के नाम से प्रलेखी, और २००६ में हैवेनस् फॉल (Heavens Fall) फिल्म बनी है।
इस श्रंखला की अगली कड़ी में चर्चा करेंगे कि इस मुकदमे ने किस तरह से हारपर ली पर असर डाला और उन्हें 'टु किल अ मॉकिंगबर्ड' लिखने के लिये प्रेरित किया।