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मेरे शरीर में हनुमान जी आ गये थे

बच्चों के साथ समय बिताना जरूरी है।
इस चिट्ठी में, अपने बेटे के साथ बिताये, कुछ भावुक पलों की चर्चा है।



कुछ दिन पहले ज्ञानदत्त जी की चिट्ठी में, उनके द्वारा दिखाये गये विडियो में, जहां एक पिता अपनी पुत्री को पीठ पर बिठा कर ले जा रहा है पर उनकी पत्नी का ऊलाहना पढ़ा,
'तुमने अपने बच्चों को कभी इस तरह पीठ पर नहीं उठाया होगा। कम से कम ज्ञानेन्द्र को तो कभी नहीं। क्यों रख्खा उससे छत्तीस का आंकड़ा शुरू से?'
निशांत जी की टिप्पणी पर, उनका उत्तर,
'ऐसा था जरूर। कैरियर बनाने का बोझ कुछ ज्यादा ही था तब। या समय प्रबन्धन लचर?' 
शायद यह सच न हो। वास्तव में जरूरत के समय, हमें कहीं से ऐसी शक्ति मिल जाती है, जिसकी हम कल्पना नहीं कर पाते हैं।

यह १९८० के दशक की बात है। मैं अपने मित्र की शादी में मुम्बई गया था।  मुन्ना ८-९ साल का था वह भी मेरे साथ था। लेकिन, शुभा अपने शोध में वयस्त थी इसलिये कस्बे में ही रह गयी थी। मेरी चाचा और चाची मुम्बई में सरकारी नौकरी करते थे। चाची डाक्टर थीं और वे अस्पताल में काम करते थीं। हम उन्हीं के पास ठहरे थे। 

हमारे पास एक दिन खाली था। हमने मुम्बई देखने के लिये, पर्यटन विभाग से बस का टूर लिया। 

हम गोरेगावं में स्थित आरे दूध-डेरी भी देखने गये। वहां हम लोग को कुछ देर रुकने की बात थी। वहां पार्क था। हम लोग वहां गये। वहां एक ५० फीट लम्बी रेलिंग भी लगी थी। यह वास्तव में जमीन में जमी नहीं थी पर वहीं पर खड़ी थी पर इस बात की कोई नोटिस नहीं थी। वह रेलिंग मुन्ने के पैर पर गिर गयी। वह मनों भारी होगी। मैंने उसे कुछ ऊपर किया फिर मुन्ने का पैर बाहर किया। उसे न केवल दर्द हो रहा था पर वह डर भी गया था।

बस में एक महिला गाइड और बस ड्राइवर थे। मैंने उन्हें डाक्टर के पास ले चलने की बात की। लेकिन उन्होंने वहां जाने के लिये मना कर दिया। उनके अनुसार वे रास्ता नहीं बदल नहीं सकते थे। वहां पर लोगों ने डेरी के डाक्टर का घर बताया जो कि लगभग ३५०-४०० मीटर दूर था। वहां कोई सुविधा न होने के कारण मैं मुन्ने को गोदी में उठा कर डाक्टर के पास ले गया।

वह डाक्टर भी अजीब था। न व हिन्दी, न ही अंग्रेजी बोल पाता था - केवल मराठी बोल पा रहा था। मैं मराठी नहीं समझ पा रहा था। मुझे आश्चर्य हुआ कि हिन्दुस्तान में भी, ऐसे डाक्टर हो सकते हैं जो अंग्रेजी न बोल सकें। मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि वह डाक्टर है। मुझे लगा कि मैं अपनी चाची के पास, उनके अस्पताल में जाऊं। मैंने उससे कुछ बर्फ ली। उसे रुमाल में रख कर, मुन्ने को पैर पर रखने को कहा, ताकि वहां सूजन न हो, और वापस चला।  

वहां से वापस आने के लिये कोई सुविधा नहीं थी। मुझे इतना बताया कि किस तरफ से, मुझे टैक्सी मिल सकती है। मैं मुन्ने को गोद में लिये लगभग२-३ किलोमीटर उठा कर गया वहां पर एक तीन व्हीलर मिला। उसने अस्पताल तक ले जाने में, असमर्थता बताई, क्योंकि  मुम्बई के अन्दर तीन व्हीलर चलाने की मनाही थी पर वह वहां तक ले गया जहां मुझे टैक्सी मिल सकती थी - शायद वह जगह बान्द्रा थी। वहां से मैंने टैक्सी पकड़ी और अपनी चाची के अस्पताल पहुंचा। 

शुक्र था कि पैर की हड्डी नहीं टूटी थी। केवल मामुली सी चोट थी। कस्बे में वापस आने पर शुभा ने पूछा कि मैं कैसे मुन्ने को गोदी पर उठा कर इतनी दूर चल सका। मैंने कहा, 
'यदि उस दिन मुझे मुन्ने को उठा कर अस्पताल तक ले जाना होता तो भी मैं यह कर पाता। वह पल ही ऐसा था। लगता था कि मेरे शरीर में हनुमान जी आ गये थे।'

ऐसे ज्ञान जी की उस चिट्ठी पर, दिनेश जी ने भी पते की बात कही,
'बच्चों को समय देना ही चाहिए, जितना दे सकें।'
इसका अपना महत्व है। उस दिन यदि मैं मुन्ने को उठा कर न ले आ पाता, तब भी उसे कुछ न होता क्योंकि उसे साधारण चोट आयी थी। लेकिन मैं वह कर सका, यह मुझे और बेटे राजा को ज्यादा करीब ले गया। 

मुझे हमेशा लगता है यदि आप घूमने जायें तब हमेशा बच्चों को साथ ले जायें। उनके साथ समय व्यतीत करें। मैंने कई दिन और बेटे के साथ, रात में तारे देखते, ताराघरों, पुस्तक मेला और पुस्तकों की दुकानों के चक्कर लगाते हुऐ, खेल के मैदान में खेलते हुऐ, चिड़ियाघर,  और राष्ट्रीय उद्यान में जानवरों के देखते बितायें हैं। इनमें से कुछ बिताये पलों को,  'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा', 'सफलता हमेशा काम के बाद आती है', 'प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो' 'यौन शिक्षा' 'दूसरे की गलती से सीखने वाले, बुद्धिमान होते हैं' 'बच्चे व्यवहार से सीखते हैं, न कि उपदेश से', 'क्या टैटूईन ग्रह की तरह हमारे भी दो सूरज होंगे' चिट्ठियों में लिखा भी है। 

कुछ यही बात मैं अपनी चिट्ठी 'पुरुष बच्चों को देखे - महिलाएं मौज मस्ती करें' में कहने का प्रयत्न किया था लेकिन शायद पहले वह स्पष्ट नहीं था।

बेटे राजा, परी, भारत में आज बसन्त का त्योहार है। आज का दिन तुम दोनो के लिये महत्वपूर्ण है। 
इसे संजो कर रखना। अपने आने वाली पीढ़ी के लिये, मेरी बात का भी ध्यान रखना।


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About this post in Hindi-Roman and English bachon ke sath samay bitana jruri hai. is chitthi mein apne bete ke sath bitaye gaye kuchh bhavuk palon kee charchaa hai.  yeh hindi {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

It is important to spend time wth children. This post is about some touching and anxious moments spend with my son. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
culture, Family, Inspiration, life, Life, Relationship, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन, दर्शन, जी भर कर जियो,

मन में है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन

यदि जान है, तो जहान है। यदि लगन है इच्छा है, विश्वास है, तब कामयाबी दूर नहीं। यह चिट्ठी मेरी ई-पाती श्रृंखला की एक चिट्ठी है।

मुन्ने राजा,
आज का दिन, न तुम्हारे लिये, पर हमारे लिये भी महत्वपूर्ण है। हमारे लिये यह दिन, कितनी खुशियां लेकर आया। इस दिन के साथ, बचपन की कितनी यादें हैं - तुम्हारे साथ खेलना, पहेलियां बूझना, रातों में तारे और पुच्छल तारे देखना, छुट्टियों में जंगलों में जानवर देखने जाना, और तुम्हारी पैराकीटस् - वे सब हमें याद आते हैं। लेकिन समय के बीतते, बीतते कुछ और भी समझने की जरूरत है।   

एक बालगीत है,
'The best six doctors anywhere
And no one can deny it
Are sunshine, water, rest, and air
Exercise and diet.
These six will gladly you attend
If only you are willing
Your mind they'll ease
Your will they'll mend
And charge you not a shilling.'
दुनिया के सबसे अच्छे छः डाक्टर,
जिसे कोई मना कर सकता नहीं,
वह हैं, धूप, जल, संतुष्टि, और वायु,
इसी के साथ हैं व्यायाम और संतुलित आहार।
यदि तुम चाहो,
तो सब कर सकते हो।
देंगे तुम्हें यह शान्ति।
करेंगे के तुम्हारी इच्छा शक्ति में परिवर्तन।
लेकिन लेंगें नहीं, तुमसे कोई यह पैसा।
जान है, तो जहान है। यह बचपन में कम समझ में आता है। उस समय सब सहन करने की शक्ति होती है और हमें यह गलत सा लगता है। लेकिन उम्र के ढ़लते यह धीरे धीरे शक्ति के ह्रास के साथ इसकी सार्थकता समझ में आती है। यदि जहान है,  इच्छा है, विश्वास और लगन है, तब


'We shall overcome
We shall overcome
We shall overcome some day
Oh, deep in my heart
I do believe
We shall overcome some day'
हम होंगे कामयाब,
हम होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब, एक दिन
ओह, मन में है विश्वास,
पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब, एक दिन।

परी को प्यार 
पापा और मम्मा

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मेरी खूबसूरती का राज़ है ...

इस चिट्ठी में महिलाओं की सुन्दरता के बारे में कहे गये ऑड्री हेपबर्न के शब्द हैं। हांलाकि,  यह पुरुषों के लिये भी सच हैं।
फिल्म रोमन हॉलीडे में ऑड्री हेपबर्न

बचपन में हमें, हिन्दी फिल्म देखने की मनाही थी। हिन्दी में केवल बच्चों का शो ही देख सकते थे। लेकिन अंग्रेजी फिल्में देख सकते थे। इसलिये बचपन अंग्रेजी फिल्में देखते ही बीता। हांलाकि अब अंग्रेजी फिल्में देखने को तरस जाते हैं। डबिंग के कारण,  अब तो विदेशी भी हिन्दी बोलते नजर आते हैं जो मुझे अटपटा सा लगता है।


बचपन में मेरी प्रिय कलाकारा ऑड्री हेपबर्न थीं। मैंने 'हमने जानी है रिश्तों में रमती खुशबू' श्रृंखला के अन्तर्गत, उनके बारे में 'अनन्त प्रेम' एवं उनकी प्रसिद्ध फिल्म 'रोमन हॉलीडे' के बारे में भी लिखा था।

ऑड्री हेपबर्न का चित्र मेरे कमरे की दीवालों पर बहुत समय तक रहा। बाद में जब हिन्दी फिल्में देखना शुरु किया तब वहीदा रहमान भी पसन्द आने लगीं - उनका भी चित्र कुछ दिनो तक दीवालों पर रहा।

फिल्म 'माई फेयर लेडी' में 
हम सब मित्र अपने बचपन की यादों को संजोये हैं और अक्सर उनके बारे में बात करते हैं। हम सब की पत्नियां भी इसका हिस्सा रहती हैं। कुछ दिन पहले मेरे मित्र की पत्नी ने ई-मेल कर मुझे ऑड्री हेपबर्न कर द्वारा कहे गये महिलाओं की सुन्दरता के बारे विचार बताये। मेरी नजर में, यह ऑड्री हेपबर्न को और सुन्दर बना देते हैं। वह कहती हैं,
'For attractive lips, speak words of kindness.
खूबसूरत ओठ के लिए विन्रमता के शब्द बोलें।

For lovely eyes, seek out the good in people.
खूबसूरत आँखों के लिए, लोगों में अच्छाइयाँ ढूंढो।

For a slim figure, share your food with the hungry.
खूबसूरत काया के लिए अपने भोजन को जो भूखे हों उनमें बांटे।

For beautiful hair, let a child run his or her fingers through it once a day.
खूबसूरत बालों के लिए दिन में, एक बार किसी छोटे बच्चे एवं बच्चियों से बाल में अंगुली फिरवायें।

For poise, walk with the knowledge that you never walk alone.
खूबसूरत चाल के लिये, यह सोच कर चलें कि आप अकेले नहीं हैं।

Remember, if you ever need a helping hand, you'll find them at the end of each of your arms. As you grow older, you will discover that you have two hands, one for helping yourself, the other for helping others.
याद रखें कि यदि आपको कभी किसी की मदद की आवश्यकता हो उन्हें अपने दोनों कंधों के अन्त में पायेगे। जैसे, जैसे आप अधिक आयु के होगें आपको ज्ञात होगा कि आपके पास दो हाथ हैं जिसमें कि  और एक हाथ आपके स्वयं के मदद के लिए तथा दूसरा, दूसरों की मदद के लिए है।

The beauty of a woman is not in the clothes she wears, the figure that she carries, or the way she combs her hair. The beauty of a woman must be seen from in her eyes, because that is the doorway to her heart, the place where love resides.
स्त्री की खूबसूरती उनके कपड़ों या उनके शरीर में या किस तरह से बाल झाड़ती है उससे नहीं है। उनकी खूबसूरती उनकी आँखों में देखी जा सकती है। यही रास्ता उनके दिल तक पहुंचने का है। जहां पर प्यार निवास करता है।

The beauty of a woman is not in a facial mode, but the true beauty in a woman is reflected in her soul. It is the caring that she lovingly gives, the passion that she shows.
औरतों की खूबसूरती उनके चेहरों से नहीं होती है परन्तु उनकी आत्मा से झलकती है। उनकी खूबसूरती प्रेमपूर्वक 
दूसरों का ध्यान और ख्याल रखने के जोश में है।

The beauty of a woman grows with the passing years.
समय बीतने के साथ औरतों की खूबसूरती और बढ़ती है।'

ऑड्री हेपबर्न ने, न केवल कहा पर अपने कहे पर अमल भी किया। वे बहुत सालों तक (UNICEF) के साथ संबन्धित रहीं और उसके लिये काम किया। इन सब बातों ने उन्हें कितना सुन्दर बनाया, यह इस चित्र से पता लगता है।
 

यह चित्र उसी ईमेल के साथ आया था।


मुझे मालुम है कि आप यहां ऑड्री हेपबर्न के बारे में पढ़ने नहीं आये थे। इस शीर्षक से तो आप लक्स साबुन के विज्ञापन का सोच कर आये थे तो देखिये और सुनिये इसके नये प्यारे से विज्ञापन के साथ ऐशर्वया और अभिषेक के विचार।

शायद यह भी सच हो। लेकिन  ऑड्री हेपबर्न का कहना अवश्य सच है।

   
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is chitthi mein audrey hepburn ke dvara mahilaon kee sundrta ke baare mein kahe gaye vichaar hain. hanlaki yeh purushon ke baare mein bhee sach hai. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post shares thoughts of Audrey Heprun regading beauty of a women thoguh thsy are applicable to men also. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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नग्गर में, रोरिख संग्रहालय

इस चिट्ठी में, नग्गर में स्थित,  रोरिक संग्रहालय की चर्चा है।
रोरिक परिवार सहित नग्गर में - चित्र विकिपीडिया से

प्रोफेसर निकोलस रोरिख (जन्म ९ अक्टूबर १८७४ - मृत्यु १३ दिसंबर १९४७) रूसी दार्शिनक, लेखक, एवं पेंटर थे। वे रोरिख समझौते के जनक हैं। यह समझौता सभ्यताओं की रक्षा को कानूनी जामा पहनाता है और मुख्य रूप से बताता है कि संस्कृति की सुरक्षा सैन्य आवश्यकता से अधिक महत्वपूर्ण है। 

रौरिख ने अपने जीवन के  अंतिम, लगभग २१ साल भारत में हिमाचल के कस्बे, नग्गर में बिताये। यहीं रोरिक मेमोरियल ट्रस्ट बनाया गया है और इनके घर को संग्रहालय में बदल दिया गया है। इसी तरह का एक अन्य संग्रहालय दार्जिलिंग और बैंगलोर में भी है। हम लोग, कुल्लू से,  इसे देखने गये।

इस संग्रहालय के ऊपर उर्सवती हिमालय रिसर्च इंस्टीट्यूट बना है। इसमें भी संग्रहालय है। रोरिख के बड़े पुत्र ने हर्बल औषधि के क्षेत्र में काम करते थे। उस संग्रहालय में चिड़िया है और हर्बल औषधि बनाने के औजार है। इस समय यहां संगीत एवं पेंटिंग की भी शिक्षा दी जाती है। इसका डिप्लोमा चंडीगढ़ से दिया जाता है। 
रोरिक संग्रहालय
रोरिख का घर बहुत सुन्दर जगह पर है। यहां से ब्यास नदी का बहुत सुन्दर दूश्य दिखायी पड़ता है। वहां जाकर लगा क्यों न यहीं बैठ कर कुछ रचनात्मक कार्य किया जाये। 
संग्रहालय से खरीदा गया देविका रानी का चित्र 
 
रोरिख के दो  पुत्र थे। उनके छोटे पुत्र की शादी एक प्रसिद्घ फिल्मकारा देवका रानी से हुई थी।


संग्राहालय में यादगार वस्तुये भी ख़रीद सकते हैं और यह बहुत अच्छी बात है। यह अक्सर हिंदुस्तान के संग्रहालय में नही होता है। लेकिन यहां पर सब मिल रहा था । वहां से मैने एक पेपर वेट और देवकी रानी का बना हुआ चित्र भी खरीदा।

अगली बार, हम लोग मनाली से चायल चलेंगे। जहां हिमाचल सरकार के पर्यटन विभाग के प्रीमियम हैरीटेज़ होटल में मेरी मुलाकात, एक सुन्दर केशों की मलिका, साहिबा से हुई थी।

रोरिख के बारे में कुछ और जानकारी और उनकी पेंटिंग आप यहां देख सकते हैं।


देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा - अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। लगता है कि विंडोज़ पर काम करना सीख ही लूं।। गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है।। बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति।। यह माईक की सबसे बडी भूल थी।। भारत में आधारभूत संरचना है ही नहीं।। सुनते तो हो नहीं, जो करना हो सो करो।। रानी मुकर्जी हों साथ, जगह तो सुन्दर ही लगेगी।। उसकी यह अदा भा गयी।। यह बौद्व मंदिर है न कि हिन्दू मंदिर।। रास्ता तो एक ही है, भाग कर जायेंगे कैसे।। वह कुछ असमंजस में पड़ गयी।। हमने भगवान शिव को याद किया और आप मिल गये।। अपनी टूर दी फ्रांस - हिमाचल की साइकिल रेस।। और वह शर्मा गयी।। पता नहीं हलुवा घी में,  या घी हलुवे में तैर रहा था।। अभी तक इसका पैसा नहीं निकल पाया है।। नग्गर में, रोरिख संग्रहालय।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।

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This post talks about Rorich museum in Naggar.  It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान लंगूर थे

इस चिट्ठी में चर्चा है कि, हिन्दुओं में विकासवाद का क्यों नहीं विरोध हुआ, और क्या भगवान विष्णु का वामन अवतार होमो फ्लॉरेसिएन्सिस (जिसके अस्थि पंजर इंडोनीशिया में मिले हैं) से प्रेरित है।
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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पाश्चात्य देशों में, डार्विन के विकासवाद का विरोध हुआ। अमेरिका में यह अब भी जारी है। हिन्दुओं में यह विरोध नहीं हुआ। ऐसा क्यों है? 

मुझे लगता है कि हिन्दूओं में सृष्टि रचना के बारे में कई विचारधारायें हैं। इनके बारे में, मैंने अपनी चिट्ठियों में लिखा है। इन कहानियों में, एक में तो सृजनवाद है पर किसी और में नहीं - शायद यही कारण हो कि हिन्दुओं में डार्विन के विकासवाद का विरोध नही हुआ। इस बारे में जब मैंने विस्तार से जानना चाहा तो कुछ यह पता चला।

पतञ्जलि योग पीठ में, ऋषि पतञ्जलि की प्रतिमा

मेरे पिता के अनुसार, पतञ्जलि का योग दर्शन कुछ और नहीं पर डार्विन का विकासवाद है। विकिपीडिया में कुछ भी कुछ इस तरह के भी विचार हैं कि स्वामी विवेकानन्द ने, पतञ्जलि  के योगसूत्र पर लिखते हुऐ कहा है कि अद्वैत वेदान्त का विकासवाद, डार्विन के विकासवाद के सिद्धान्त के अनुरूप है। भारतीय दर्शन या पतञ्जलि  का योग दर्शन मैंने नहीं पढ़ा है। इसे  पढ़ने का प्रयत्न किया। लेकिन मुझे यह मुश्किल लगा। मुझे अच्छा लगेगा यदि दीपक भारतीय जी, या कोई अन्य चिट्टाकार बन्धु इसकी आसान शब्दों में व्याख्या कर, लिखे।

एक अन्य विचारधारा के अनुसार, सृजनवाद पढ़ाना और डार्विन का विरोध - ईसायित से जुड़ गया है। इसका विरोध ईसायित का समर्थन समझा जाने लगा। इसलिये और धर्मों में, डार्विन के विकासवाद का विरोध नहीं के बराबर हुआ।

अरविन्द मिश्र जी ने मेरा ध्यान, जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक 'द डिस्कवरी ऑफ इंडिया' (The Discovery of India published by Oxford University Press) पर दिलाया। इसके पेज ११६ पर नेहरू जी लिखते हैं,
'Nevertheless the Old Indians, unlike the other ancient nations, had vast conceptions of time and space. They thought in a big way. Even their mythology deals with ages of hundreds of millions of years. To them the vast periods of modern geology or the astronomical distances of the stars would not have come as surprise. Because of this background, Darwin's and other similar theories could not create in India the turmoil and inner conflict which they produced in Europe. The popular mind in Europe was used to a time scale which did not go beyond a few thousand years.'
प्राचीन भारतीय, अन्य देशों की तरह से नहीं थे। उन्हें दूरी एवं यगान्तर का ज्ञान था। वे बड़ी तरह से सोचते थे। हमारे पुराण खरबों साल की बात करते हैं। हमें भूगर्भशास्त्र में लम्बे समय के कालचक्र या तारों की दूरी से, कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यही कारण है कि डार्विन के या इस तरह के अन्य सिद्धान्त ने उस तरह की मुश्किल नहीं खड़ी की, जैसा युरोप में हुआ। युरोप के लोगों के दिमाग में,  इतने बड़े समय का विचार ही नहीं था। वे केवल कुछ हज़ार साल के बारे में सोचते थे।
इस श्रंखला की तीन चिट्ठियां हिन्दूओं में सृष्टि रचना के बारे में यहां, यहां, और यहां लिखी हैं। इन चिट्ठियों और इस चिट्ठी पर अशोक पाण्डेय जी, दीपक भारतीय जी, ने इस तरफ इशारा किया है।


कुछ समय पहले यात्रा करते समय एक ज्ञानी जन से मुलाकात हुई। उनसे इस विषय पर चर्चा होने लगी। उन्होंने बताया कि पुराणों में भगवान के २४ अवतारों का वर्णन है। इसमें भगवान विष्णु के १० अवतार मुख्य हैं यह दस कुछ इस तरह से हैं
  1. मत्स्य (मछली) पानी में रहने वाले जीव;
  2. कच्छप kchchhp  (कछुआ) उभयचर जन्तुओं की उत्पत्ति; 
  3. वाराह Varaah (सुअर) – जमीन के जानवरों की उत्पत्ति;
  4. नृसिंह Narasingh – आधे मानव;
  5. वामन – बौने मानव; 
  6. परशुराम – पूर्ण विकसित मानव;
  7. राम Rama – मानव, शस्त्रों के साथ;
  8. कृष्ण – मानव, संगीत के साथ;
  9. गौतम बुद्ध Budhha – शांति और करुणा का प्रतीक;
  10. कल्कि Kalki शायद यह ८४ हज़ार साल बाद आना है। इसी के साथ कलियुग की समाप्ति है और एक चक्र पूरा होगा।
यह वही क्रम है जो डार्विन के विकासवाद में, जीवों की उत्पत्ति का क्रम है। उन सज्जन के मुताबिक डार्विन के विकासवाद का विरोध इसी कारण नहीं हुआ क्योंकि इसे हमारे पुराणों में, इसे पहले से ही बताया गया है। 

इन दस अवतारों में तीसरे के बारे में कछ बहस है। कुछ का कहना है कि वाराह अवतार तीसरा न होकर पहला है। जो इसे पहला अवतार कहते हैं वे इसे पृथ्वी की रचना से जोड़ते हैं न कि जमीन के जानवरों की उत्पत्ति से।

कुछ दिन पहले, मैंने  साइंटिफिक अमेरिकन के नवंबर २००९ के अंक में 'Rethinking "Hobbits": What They Mean for Human Evolution' नामक एक लेख पढ़ा।

'उन्मुक्त जी, क्या इस लेख का संबन्ध, भगवान विष्णु के १० अवतारों से है?'
शायद, मेरे भाई, मेरी बहना इतनी जल्दी में क्यों रहते हैं। कुछ तो इंतज़ार करिये।

सन २००४ में, इंडोनीशिया के लॅसर सुन्दा द्वीप समूह के फलॉरस्  द्वीप की, लिएंग बुआ गुफा में  कुछ अस्थि पंजर मिले थे। साइंटिफिक अमेरिकन  का उक्त लेख, उन्हीं के बारे में था। इस अस्थिपंजर को, इस गुफा के नाम पर, एलबी१ (LB1) का नाम दिया गया। यह अस्थिपंजर, हजारों साल पहले के लुप्त मानव के हैं।  चूंकि यह फलॉरस् द्वीप पर मिलें हैं। इसलिये इनका वैज्ञानिक नाम होमो फ्लॉरेसिएन्सिस रखा गया। लेकिन इनका लोकप्रिय नाम, यह नहीं है। इन्हें जेआरआर टोकियन  के लोकप्रिय उपन्यासों के मानव,  हॉबिट के नाम से जाना जाता है। क्या आपको मालुम है कि ऐसा क्यों है? 

होमो फ्लॉरेसिएन्सिस एवं मानव कपाल - चित्र पीटर बॉउन/ न्यू इंगलैंड विश्विदयालय के सौजन्य से

टोकियन ने, हॉबिटों के बारे में चर्चा, सबसे पहले बच्चों के लिये लिखे उपन्यास 'द हॉबिट'  में की थी। इसके बाद इनकी चर्चा, लॉर्ड ऑफ रिंगस् की तीन पुस्तकों (Triolgy) में की। यह ऐसी सभ्यता है, जिसमें बौने (तीन से चार फीट के बीच) रहा करते हैं। इन बौनो को, उन्होंने  हॉबिट (Hobbit) कहा। इंडोनीशिया में मिले होमो फ्लॉरेसिएन्सिस  के अस्थिपंजर यह बताते हैं कि यह भी बौने थे और उनकी लम्बाई तीन से चार फीट के बीच थी। इसलिये इनका लोकप्रिय नाम हॉबिट है। क्या यह आपको किसी और की याद दिलाते हैं?

भगवान विष्णु, वामनअवतार में राजा बालि से तीन कदम जमीन मांगते हुऐ चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से

क्या आपको इनका संबन्ध हिन्दू धर्म से लगता है? क्या भगवान विष्णु का चौथा अवतार होमो फ्लॉरेसिएन्सिस से प्रेरित था? क्या भगवान के विष्णु के अवतार,  डार्विन के विकासवाद को नहीं बताते हैं? मैं कह नहीं सकता, कुछ उलझन में फंस गया हूं।

चलते चलते, एक दिन मित्र मंडली के साथ डार्विन पर चर्चा हो रही थी। मेरे शायर दोस्त ने, अकबर इलाहाबादी का यह शेर सुनाया,
हज़रते डार्विन, हकीकत से बहुत दूर थे।
हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान [पूर्वज] लंगूर थे।
यह श्रंखला तो पहले समाप्त हो गयी थी यह तो केवल पुनः लेख था। कोशिश करता हूं कि किसी नयी श्रृंखला के साथ मुलाकात करूं। लेकिन समय आभाव के कारण कुछ मुश्किल लग रहा है।


क्या आपने कभी विकासवाद क्यों सही है और सृजनवाद गलत इस बात को रैप नृत्य के साथ देखा है। नहीं न तो यहां इसका मजा लें।


डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े 
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल - व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।। विकासवाद पढ़ाना मना करना, मज़हबी निष्पक्षता का प्रतीक नहीं।। सृजनवाद धार्मिक मत है विज्ञान नहीं है।। 'इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन' - सृजनवादियों का नया पैंतरा।। यू हैव किल्ड गॉड, सर।। हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान लंगूर थे।।

इस चिट्ठी का पहला एवं आखरी चित्र - विकीपीडिया के सौजन्य से

About this post in Hindi-Roman and English
is chitthi mein charcha hai ki, hinduon mein vikasvaad ka kyon nahee virodh hua, aur kyaa bhagwan vishnu ka vaman avtar, homo floresiensis (jiske asthi panjar indonesia mein mile) se prerit hai. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post talks about why there was no opposition of evolution among Hindus and was Vaman reincarnation of Vishu inspired by homo floresiensis, whose skeleton was found in Indonesia. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


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अपने प्यार को ढ़ूंढिये

विश्वविद्यालयों का दीक्षांत समारोह, न उसके विद्यार्थियों के लिये पर विश्वविद्यालय के लिये भी महत्वपूर्ण होता है। विद्यार्थी इस दिन अपने नये जीवन में प्रवेश करते हैं और विश्वविद्यालय के लिये यह मील का पत्थर होता है। इस दिन, हर विश्विद्यालय किसी खास व्यक्ति को छात्रों के बीच व्याख्यान के लिये आमंत्रित करता है

'धत्त तेरे कि, हम तो समझे थे कि वेलेंटाइन दिवस पर उन्मुक्त जी, उन्मुक्त हो कर प्रेम चर्चा करेंगे। यहां तो मालुम नहीं कहां विश्वविद्यालय के चक्कर में पड़ गये हैं।'

स्टीव जॉबस् का यह चित्र विकीपीडिया से

स्टैनफोर्ड विश्विद्यालय दुनिया के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक है। इस विश्वविद्यालय के वर्ष २००५ के दीक्षांत समारोह पर, स्टीव जॉबस्  व्याख्यान देने के लिये आये।

स्टीव,  ऍप्पेल कंप्यूटर के जनक हैं। इसमें शक नहीं कि इन कंप्यूटरों का कोई मुकाबला नहीं है। यह दुनिया के सबसे बेहतरीन कंप्यूटर हैं। विंडोज़ तो इसे केवल कॉपी करने की कोशिश है। 

ऍप्पेल कंप्यूटर के द्वारा, मैकिंटॉश कंप्यूटर २४, जनवरी १९८४ में बजार में उतारा गया था। इसका विज्ञापन, अमेरिका की सबसे बड़ी प्रोफेशनल लीग - नेशनल फुटबाल लीग (National Football League) - के द्वारा आयोजित सुपर बोल (Super Bowl) प्रतियोगिता के दौरान, २२ जनवरी १९८४ में दिखाया गया था। इस उत्पाद ने न केवल कंप्यूटरों  की दुनिया बदल दी पर विज्ञापनो के आयाम भी। इसके बारे में मैंने यहां विस्तार से लिखा है।

मेरे बेटे को मैक ऍप्पेल कंप्यूटर पसन्द हैं। वह इसी के लैपटॉप पर काम करता है। मैं स्वयं ओपेन सोर्स का समर्थक हूं और ओपेन सोर्स पर चलने वाले कंप्यूटरों का प्रयोग करता हूं। लेकिन यदि कभी ओपेन सोर्स को छोड़ूंगा तो फिर ऍप्पेल कंप्यूटर ही लूंगा। क्यों नकल की हुई चीज ली जाय।
'कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती। चालू हो गये उन्मुक्त जी, ओपेन सोर्स के बारे में।'
स्टैनफोर्ड विश्विद्यालय में, २००५ के दीक्षांत समारोह पर, स्टीव के द्वारा दिया गया यह व्याख्यान जितना प्रेणनाप्रद है, उतना प्रेरित करने वाला भाषण कम ही सुनने को मिलता है। कम से कम, मुझे याद नहीं कि मैंने इसके पहले कब ऐसा भाषण सुना था। इसे मैं कई बार सुन चुका हूं। मुझे लगा कि प्रेम के दिवस पर इससे अच्छी कोई और चिट्ठी नहीं हो सकती है।
'किसी ने सच कहा है कि बुढ़ापे की तरफ पहुंचते ही लोग सठियाने लगते हैं। उन्मुक्त जी, अधिक उम्र वाले हिन्दी चिट्ठाकार हैं। उनकी आंखें कमजोर हो गयीं हैं, २००८ में मरते मरते बचे थे - लगता है कि अब सठिया भी गये हैं। आज के रोज कोई बढ़िया सी प्यार के बारे में चिट्ठी लिखनी थी। यहां तो भाषण की बात करने लगे - भगवान ही इनका मालिक है।'

स्टीव के जीवन में तीन महत्वपूर्ण घटनायें हुई हैं,
  • पहली, वे विश्वविद्यालय तो गये पर डिग्री न ले सके। उन्होंने विश्विद्यालय छोड़ दिया (ड्रॉप आउट)। 
  • दूसरा, वे ऍप्पेल कंप्यूटर से निकाल दिये गये। ऍप्पेल कंपनी डूबने लगी। उसने स्टीव से वापस आने की प्रार्थना की। आज ऍप्पेल कंपनी पुनः बुलंदियों पर है। इसका कारण वे ही हैं।
  • तीसरा, उन्हे पाचक-ग्रंथि में कैंसर हो गया और पता चला कि वे छः महीने तक ही जीवित रह सकेंगे। लेकिन बाद में पता चला कि यह कैंसर ऑपरेशन से ठीक हो सकता है। वे ऑपरेशन करा कर ठीक हो गये।   
इस भाषण में, वे इन्हीं तीन घटनाओं का जिक्र करते हुऐ, जीवन के दर्शन को बताते हैं।
'मैं तो चला चिट्ठाचर्चा देखने। उन्मुक्त जी तो वहां मिलते नहीं हैं। लेकिन  आज तो वहां बढ़िया, बढ़िया प्रेम चिट्ठियों के लिंक होंगे। यहां तो बोरियत हो रही है। मालुम नहीं क्यों, आज के दिन यह चिट्ठी प्रकाशित कर दी है।'
अपने व्याख्यान में, स्टीव कहते है कि,
'The only thing that kept me going was that I loved what I did. You've got to find what you love ... the only way to do great work is to love what you do. If you haven't found it yet, keep looking. Don't settle. As with all matters of the heart, you'll know when you find it. And, like any great relationship, it just gets better and better as the years roll on.'
मैं जो भी करता हूं उससे प्यार करता हूं। इसी ने मुझे आगे चलते रहने की प्रेणना दी। तुम्हे वह तलाशना है जिससे तुम प्यार करते हो ... जीवन में किसी बड़े सफल काम को करने के लिऐ, तुम जो भी करो, उससे प्यार करो। यदि तुम्हें अपना प्यार नहीं मिला है तो उसे ढूंढो - रुको नहीं। तुम्हें मालुम चल जायगा जब वह तुम्हें मिलेगा। यह दिल के किसी भी अन्य विषय की तरह है। समय बीतते, यह किसी भी अन्य रिश्ते की तरह बेहतर होता जायेगा।
 
उसकी यदि आप स्टीव के भाषण को पढ़ें तो आपको लगेगा कि उसके जीवन की इन तीनों महत्वपूर्ण घटनाओं को, जीवन के दर्शन से जोड़ने वाला धागा,  प्यार ही है। बस, इसी लिऐ, मैंने इसे प्यार दिवस पर इस चिट्ठी को प्रकाशित किया है। 

यदि आपने इस वीडियो को नहीं देखा है तब अवश्य देखिये। अपने बेटे, बेटियों, और बहुओं को भी दिखायें। यह न केवल उनके लिऐ पर आपके  लिये भी महत्वपूर्ण है - चाहे आपकी उम्र जो भी हो।


जिसमें मन लगे उसे ही करो। यह बात न केवल स्टीव कहते हैं पर शायद हर बड़ा व्यक्ति। कुछ समय पहले भौतिक शास्त्र में नोबेल पुरुस्कार विजेता  रिचर्ड फाइनमेन पर एक श्रंखला लिख कर उसे यहां संग्रहीत किया है। इस श्रंखला में उनके द्वारा दूसरे शब्दों कही गयी यही बात यहां प्रकाशित की है। रिचार्ड फाइनमेन के लिखे पत्रों संग्रहीत कर लिखी गयी बेहतरीन पुस्तक 'Don’t you have time to think' है। मैंने इसकी समीक्षा कई कड़ियों में कर इसे यहां संग्रहीत किया है। 

लीसा से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। उसके और मेरे बीच बीच ई-मेल की चर्चा में ई-पाती नामक श्रंखला में करता हूं। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। इससे संबन्धित एक चिट्ठी,  लीसा, अपने मन की बात सुनो में मैंने इसे अपने शब्दों में लिखा है।
'उन्मुक्त जी, यह सब छोड़िये, यह तो बताइये कि क्या आप वह काम करते हैं जो आपके दिल के सबसे पास था?'
नहीं, मैं वह नहीं कर पाया। मेरे विद्यार्थी जीवन के समय, जो मां-बाप ने कह देते थे, वही किया जाता था। मैंने भी वैसा ही किया। मेरे पुराने सहपाठी जब भी मिलते हैं तो हमेशा कहते हैं कि वे कभी नहीं सोचते थे कि मैं फाइलों को इधर उधर करूंगा। लेकिन यह भी सच है कि मैंने जो भी किया या करता हूं उस पर न केवल विश्वास करता हूं पर उसे प्यार भी करता हूं। चाहे वह हिन्दी की चिट्ठाकारी ही क्यों न हो :-)

प्रेम और वेलेंटाइन से संबन्धित मेरी कुछ अन्य चिट्ठियां
जाने क्यों लोग ज़हर ज़िन्दगी में भरते हैं।। वेलेंटाइन दिवस, ओपेन सोर्स के साथ मनायें।। वेलेंटाईन दिन।। लिनेक्स प्रेमी पुरुष - ज्यादा कामुक और भावुक???।। तो क्या खिड़की प्रेमी ठंडे और कठोर होते हैं?।। Love means not ever having to say you're sorry।। अनएन्डिंग लव।। प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो।। प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।। जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते है।। प्यार किया तो डरना क्या।।

जीवन के दर्शन के बारे में मेरी कुछ चिट्ठियां

अभिषेक जी ने टिप्पणी कर दस बेहतरीन दीक्षांत व्याख्यान के बारे में जानकारी दी है। इसके लिंक नीचे दिये गये हैं। इन्हें भी देखें।


हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi

सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट, 
'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने
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About this post in Hindi, Roman, and English
यह चिट्ठी नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। यह बताती कि जो भी करो उससे प्यार करो तभी सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी।

yeh chitthi nayee peedhee ko smjhne, unse dooree kum karne, aur unhein jeevan ke moolyon ko smjhaane ka praytna hai. yeh bataatee hai ki jo bhi karo usase pyaar karo tabhi saphalta tumhare kadam choomegee. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is an attempt to understand the new generation, bridge the between gap and to inculcate right values in them. You should love whatever you do - only then you will succeed. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द
Steve Jobs, Stanford University, Valentine day,
culture, Family, life, Life, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो, मौज मस्ती, पसन्द-नापसन्द,

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