इस चिट्ठी में पॉन्डिचेरी में फ्रांसीसी खाने की चर्चा है।
पॉन्डेचेरी के समुद्र तट पर एक और शाम
पॉन्डिचेरी फ्रांसीसी कॉलोनी थी। इसलिए यहां फ्रांसीसी भाषा का चलन है। यहां के रेस्त्रां का फ्रांसीसी खाना भी प्रसिद्ध है। हम लोग पहले दिन फ्रांसीसी खाना खाने, यहां के रांडवू (Rendezvous) नामक रेस्त्रां में गये।
रांडवू रेस्त्रां में, हम लोगों ने खाने में, ग्रिल्ड ब्लैक्ड पॉम्फ्रेट (Grilled blacked Pomfret), ग्रिल्ड सियर फिश (Grilled Sear fish), मशरूम प्रोन किश (Mushroom Prawn Quiche) लिया। इनमें ग्रिल्ड पॉम्फ्रेट और मशरूम प्रोन किश तो बिल्कुल बेकार लगा। हम उसे न खा सके। वह व्यर्थ हो गया।
हम लोग वहां पर, दूसरी रात में एक दूसरे रेस्त्रां में 'ला क्लब' (Le club) खाने गये। यहां पर हमने सियर फिश फ्रेंच स्टाइल (Sear fish french style), प्रोन्स् कैरिबिएन स्टाइल (Prawns Caribbean style) ली। इसके साथ हमने स्ट्रोबेरी कोलाडा (Strawberry colada) और सी ग्रीन (Sea green) नाम की मॉकटेल भी ली। यह कुछ पसंद आयी। खाना भी अच्छा था।
'ला क्लब' में कुछ अजीब बात लगी। यहां पर बहुत से विदेशी लोग थे। सारी महिलाएं लगातार सिग्रेट पी रही थी। हालांकि सब पुरूष बिलकुल या नहीं के बराबर सिग्रेट पी रहे थे। मेरे विचार से, सिग्रेट पीना न केवल नुकसान देय है पर यह भी दर्शाता है कि वह व्यक्ति कितना असुरक्षित एवं निराश है।
यह रेस्त्रां एक खुली जगह पर था। फिर भी, वहां सिगरेट की बदबू के कारण बैठना मुश्किल हो रहा था। मेरे बगल के मेज़ पर दो महिलाएं बैठी थी। हम लोग जितनी देर तक खाने का इन्तेजार किया और खाना खाया उतनी देर में इन महिलाओं ने कम से कम चार-चार सिगरेटें अवश्य पी होंगी। उनकी सिगरेट कुछ अजीब और खास तरह की लगी। वे साधारण सिगरेट से पतली और लम्बी थी। इसका भी कुछ कारण लगा।
महिलाओं ने, शायद सिगरेट इसलिये पीना शुरू किया कि वे पुरूषों की नकल करना चाहती थीं और इसे शायद महिला सशक्तिकरण की तरह देखती थीं। इसीलिए सिगरेट बनाने वाली कम्पनियां उन्हें आकर्षित करने के लिए अलग तरह की सिगरेट एवं विज्ञापन बनाने लगीं ताकि उनकी बिक्री बढ़ सके। बहुत सी महिलाएं, खास तौर से युवतियां, उनके झांसे में आकर बेवकूफ़ बन रही हैं। हांलाकि यह बात पुरुषों एवं नवयूवकों के लिये भी सच है।
महिलाओं को आकर्षित करने के लिये सिग्रेट कम्पनी का एक पुराना विज्ञापन।
यह चित्र मेरा नहीं है। मैंने इसे यहां से लिया है जहां इस तरह के अन्य विज्ञापनों के चित्र हैं।
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यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।
हिमाचाल यात्रा के दौरान हम चायल भी गये। वहां महाराजा और पटियाला यादुवेन्द्र सिंह का महल था। १९७२ में, इसे हिमाचल सरकार के पर्यटन विभाग ने खरीद लिया। इसमें अब एक प्रीमियम हैरीटेज़ होटल बना दिया है। हम लोग इस होटेल को देखने गये। इसके बारे में विस्तार से, इस यात्रा विवरण के दौरान बात करेंगे। लेकिन, आज उस होटल में हुई एक घटना के बारे में।
लेकिन, यह आज क्यों? यह तो आपको अन्त में ही बात चलेगा।
होटल की मुख्य इमारत को के सामने एक बहुत बड़ा सा लॉन है। यह कोई फुटबॉल के मैदान के बराबर होगा। हम लोग, इस लॉन पर चल कर होटेल के अन्दर गये। लॉन पर बहुत से लोग वहां के नजारे एवं समा का आनन्द ले रहे थे। वहीं लॉन मेरी मुलाकात, एक परिवार से हुई। उनके साथ एक प्यारी सी युवती थी। उसके बाल बहुत लम्बे थे। मैंने परिवार के सदस्य से, उससे सवाल पूछने की अनुमति ली। उन्होंने कहा,
'आपकी ही बेटी है, जरूर पूछिए।'
मैंने पूछा,
'बिटिया तुम्हारे बाल असली हैं या नकली।'
उसके बगल में शायद उसके बड़े भाई या पिता होंगे उन्होंने कहा,
'आप इसके बाल क्यों नहीं खींच कर देखते?'
मैंने कहा कि किसी अनजान युवती के बाल खींचने पर तो मुश्किल में फंसा जा सकता है। मैंने उस युवती से कुछ देर बात की। उसने अपना नाम साहेबा बताया और कहा,
'मेरी मां के बाल तो इससे दुगने लम्बे थे।'
हांलाकि उस समय उसकी मां ने अपने बाल छोटे कर लिऐ थे
मैंने साहेबा से कहा,
'दुनिया की हर शैम्पू कम्पनी, तुम्हें मॉडल के रूप में लेना चाहेंगी। तुम क्यों नहीं किसी शैम्पू कम्पनी के लिए मॉडलेंग करती हो?'
उसने इसका जवाब नहीं दिया। वह चुप रही। उनमें से एक वृद्ध सज्जन भी थे। उन्होंने इस सवाल का जवाब दिया,
'इसे पैसे की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसे काम करने की जरूरत नहीं।'
पुरूष समाज में अक्सर इस तरह की बात कर, महिलाओं को काम करने से रोका जाता है। मेरे विचार से, यह दकियानूसी विचार है। महिलाओं को काम करने की बात इसलिए नहीं होती कि उन्हें पैसों की जरूरत है। लेकिन महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। उनमें आत्म सम्मान आये। वे अपने मन मुताबिक, अपनी क्षमता के अनुसार, अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें।
हमें भी पैसों की जरूरत नहीं। भगवान ने हमें सब दिया। लेकिन फिर भी मेरी पत्नी शुभा पढ़ाती है।
मैने वृद्ध सज्जन को जीवन का यह दर्शन समझाने का प्रयत्न किया, लेकिन मैं नहीं कह सकता कि वे इसे वह समझ पाये अथवा नहीं। हांलाकि साहेबा कुछ मुस्कराई, कुछ लाचार सी लगी - शायद वह मेरी बात समझ पायी या फिर वह अपने परिवार को मुझसे बेहतर समझती थी।
'उन्मुक्त जी, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस तो कल था। महिला सशक्तिकरण के बारे में आप, आज क्यों लिख रहे हैं? यह तो कल ही लिखना था।'
महिला सशक्तिकरण के बारे में, मैंने विस्तार से कड़ियों में, २००७ में इसी चिट्ठे पर लिखा था। इसे मैंने संकलित कर एक जगह आज की दुर्गा - महिला सशक्तिकरण नाम से अपने लेख चिट्ठे पर डाला है। इसकी पहली कड़ी में मैंने बताया था कि यह ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है। इसे बाद में मेरी पत्नी शुभा ने, इसे चुरा कर अपने चिट्ठे की चिट्ठी 'महिला दिवस ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है?' पर डाल दिया :-)
चायल पैलेस बहुत सुन्दर जगह है। यहां कई फिल्मों की शूटिंग भी हुई है जिसमें थ्री इडियट भी है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल का यह विज्ञापन भी वहीं फिल्माया गया है। इसे देखिये और इस लॉन एवं इस पैलेस को देखें।
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इस चिट्ठी में त्रिवेन्दम में घूमने की जगहों की चर्चा है।
हम केरल घूमने, इसलिये गये थे क्योंकि मुझे त्रिवेन्द्रम में मुझे कुछ काम था। इस काम के लिये, मैंने यात्रा के आखरी दिन, दोपहर के भोजन के बाद, का समय रखा था। हमारे पास सुबह का समय था। हमने वह समय त्रिवेन्द्रम घूमने का प्रोग्राम बनाया। हम लोग सबसे पहले वहाँ के राजा के महल गये। वहां हमने एक गाइड लिया। उसने बताया,
'केरल राज्य तीन राज्यों को मिलाकर बना है। इसकी स्थापना १९५६ में हुई थी। त्रिवेन्द्रम पहले त्रावणकोर राज्य (Travancore State) में था। यहाँ पर राजा का लड़का तो नहीं, पर उस की बहन का लड़का राजा बनता था।'
महल में बाहर की तरफ उन्नीसवीं शताब्दी की बनी एक खास घड़ी, जिसमें घन्टे के पूरे होने पर उतनी बार ऊपर के बकरों सिर, एक दूसरे से टक्कर मारते हैं।
मेरे पूछने पर कि ऎसा क्यों होता था, तब उसका जवाब था,
’यह इसलिये होता था क्योंकि ट्रावनकोर राज्य मातृ प्रधान राज्य था। यदि परिवार में लड़की नहीं है तो लड़की गोद ले ली जाती थी।’
इसने मुझे शिलॉग में खसी लोगों की याद दिलायी। वह भी मातृ प्रधान समाज है। वहां पर पुरूष अपनी पत्नी का सर नाम रख लेतें हैं और उसी के घर रहने चले जाते हैं। गाइड के मुताबिक,
'यहां पुरुष शादी के बाद महिलाओं का सर नेम तो नहीं रखते पर अधिकतर पति, पत्नियों के साथ उनके घर में रहते हैं और यह गलत नहीं समझा जाता है।'
हमारे तरफ तो ऎसे लोगों को घर जमाई कहा जाता है और अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है।
महल को देखते समय गाइड ने यह बताया,
'इस महल को हजार आदमियों ने मिलकर चार साल में बनाया था। लेकिन राजा इसमे सात महीने ही रह पाये। क्योंकि उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद राजा के परिवार वालों ने इस महल को छोड़ दिया। उन्हे लगा कि यह महल अपशकुन है। इसलिए उसके बाद इस महल में कोई नहीं रहा।'
राजा के महल के बगल में ही एक भगवान विष्णु का मंदिर है। इस मंदिर में कोई कोट, पैंट पहनकर नहीं जाया जा सकता है और महिलायें सलवार, कुर्ता पहनकर नहीं जा सकती हैं। इसे देखने जाने के लिए आपको ऊपर के कपड़े उतारने पड़ेगें और एक धोती पहनकर जाना होगा। महिलायें सलवार, कुर्ता के ऊपर धोती पहन सकती है।
मुन्ने की मां मंदिर को भीतर से देखने नहीं गयी पर मुझे लगा कि इसे अन्दर से देखना चाहिए। फिर मुश्किल पड़ी धोती पहनने की। वहां पर धोती किराये पर भी मिल रही थी पर मैने वहीं पर एक केरल में पहनी जाने वाली शर्ट और धोती खरीदी। उसे ही पहन कर अन्दर गया।
मन्दिर, अन्दर से बहुत भव्य है। इसमें एक जगह सारी महिलायें भजन गा रही थीं। इसमें, भगवान विष्णु की, शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए मूर्ति है। इस मूर्ति को एक बार में नहीं देखा जा सकता है। इसके लिऐ कई दरवाजे हैं।
मैं इस मूर्ति के किसी भाग को नहीं देख पाया क्योंकि वहाँ पर भीड़ थी और मुझे लगा कि यदि में लाइन में खड़ा होऊँगा तो शायद सब समय यहीं पर चला जायेगा। मैंने महल में ही उस मूर्ति का छोटा सा मॉडल देख लिया था। त्रिवेन्द्रम में एक ताराघर (Planetarium) और चिड़ियाघर (Zoo) भी है। मैं इन्हें भी देखना चाहता था।
मंदिर देखने के बाद, हम लोग ताराघर देखने गये। वहां पता चला कि केवल एक प्रदर्शन अंग्रेजी में है और बाकी सब मलयालम में हैं। अंग्रेजी का प्रदर्शन बारह बजे था लेकिन वह तभी चलेगा जब कि कम से कम चालीस व्यक्ति देखने के लिए आये। हम लोगों को लगा कि यहां इन्तजार करने से अच्छा है कि हम चिड़िया घर देख लें।
चिड़ियाघर में तरह तरह के जानवर देखने को मिले। मैंने वहां पर जानवरों की तसवीर इस चिट्ठी में प्रकाशित की हैं। चिड़ियाघर में एक बात अजीब लगी। वहां पेड़ों पर बहुत से चमगादड़ लटके थे। हम लोग भोजने के समय वापस आ गये। मुझे अपना काम भी करना था।
मुझे काम के बाद, वहां के लोगों ने यादगार के रूप में राजा रवी वर्मा का एक चित्र यादगार के लिये भेंट किया। वे अप्रैल २९,१८४८ में जन्में त्रावणकोर राज्य के चित्रकार थे। उनकी मृत्यु अक्टूबर २, १९०६ में हो गयी।
साड़ी पहने मराठी महिला का चित्र, जो मुझे भेंट में मिला
रवी वर्मा, महाभारत एवं रामायण की घटनाओं और पारंपरिक परिधान साड़ी पहने भारतीय महिलाओं के सुन्दर चित्र बनाने के लिये जाने जाते हैं। उनके चित्र, भारतीय परम्परा और युरोपीय कला के एकीकरण के, सबसे अच्छे उदाहरण भी हैं। उन्हें १८७३ में वियाना चित्रकला प्रदर्शनी में प्रथम पुरुस्कार भी मिला। उनके अन्य चित्र आप यहां देख सकते हैं।
यदि आप त्रिवेन्दम जायें, तो यह तो हो नहीं सकता कि आप कोवलम समुद्र तट न जांये। अगली बार वहीं चलेंगे।
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यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इन फाइलों को आप सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में, फायरफॉक्स ३.५ या उसके आगे के संस्करण में सुन सकते हैं। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें। इन्हें सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में फायरफॉक्स में भी सुना जा सकता है। इसे डिफॉल्ट करने के तरीके या फायरफॉक्स में सुनने के लिये मैंने यहां विस्तार से बताया है।
ताज गार्डन रिट्रीट, कुमाराकॉम में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। इस चिट्ठी में ऑस्ट्रेलियायी महिलाओं से मुलाकात और महिला सशक्तिकरण के एक दूसरे रुप की चर्चा है।
कुमाराकॉम में भी अप्रवाही जल है। शाम के समय हमने वहां पर नाव से सैर की और सूर्यास्त का नज़ारा लिया।
नाव पर मेरी मुलाकात,आस्ट्रेलिया से आयी दो महिलाओं से भी हुई। हम लोग कुमाराकॉम से त्रिवेन्द्रम जाने वाले थे जब कि वे लोग त्रिवेन्द्रम से आ रही थीं और इसके बाद कोचीन जाने वाली थीं। वहां से वे ऊटी जा रही थीं।
शाम को गर्मी और उमस थी। मैं नेकर पहने था। उस महिला ने कहा कि वह भी नेकर पहनना चाहती थी पर उनसे बताया गया था कि वे भारत में ऐसे कपड़े न पहने। मैंने बताया,
‘भारत में पुरूष लोग नेकर पहन लेते हैं पर महिलाएं नहीं। हांलाकि इस होटल में नेकर पहन कर या नहाने की ड्रेस पहन कर घूमने में कोई एतराज़ नहीं करेगा।‘
उसने कहा,
‘तब तो मैं भी कल नेकर ही पहनूगी।‘
यह दोनो महिलाएं निरोषध चिकित्सक (Physiotherapist) थीं। उनके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में इस पेशे में पैसा बहुत कम है शायद आने वाले समय में इसमें पैसा मिले।
इन दोनों ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं के पति साथ में नहीं थे न ही उनके बच्चे साथ थे। मैंने पूछा, कि क्या आपके पति ऑस्ट्रेलिया में बच्चों की देखभाल करने के लिए रूक गये हैं। उसने कहा, नहीं। हमारे बच्चे बहुत बड़े हो गये हैं। उनकी शादी भी हो गयी है। वे लोग अलग रहते है। उसके बाद बताया,
‘हमने कई बिल्लियां पाल रखी हैं। हमारे पति ऑस्ट्रेलिया में रहकर बिल्लियों की देखभाल कर रहे हैं और हम दोनों भारत में मस्ती मारने आयें हुए हैं।‘
यह भी महिला सशक्तिकरण का एक अलग रूप है। पति ऑस्ट्रेलिया में बिल्लियां देखें और पत्नियां भारत घूमे।
रात्रि भोज पर, मेरी मुलाकात फिर से इन महिलाओं से हुयी। शाम को नाव की सैर करते समय वे नेकर तो नहीं पहने थी पर अनौपचारिक परिधान पहने थीं। रात के भोजन पर वे एकदम औपचारिक परिधान पहन कर आयीं थीं। मैंने उनकी तारीफ की वे बोली,
'रात्रि का भोजन तो खास होता है। इसलिए ये खास परिधान।‘
रात्रि भोज पर कुछ युवतियां केरल के पारम्परिक नृत्य कर रही थी। केरल में, परम्परागत परिधान में सफेद या हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी जाती है। जिसमें सुनहरा किनारा होता है। वे इसी तरह की साड़ी पहने थीं। नृत्य के पहले वे मलयालम में उस नृत्य के बारे में बताती थी। यह हमारे या वहां पर भोजन कर रहे किसी के समझ में नहीं आ रहा था। मैं इनकी मुख्य नृतकी के पास गया और उससे कहा कि वह अंग्रेजी में हमें इसके बारे में बताये ताकि हम उसे ठीक से समझ सके। अगले नृत्य के पहले उसने ऎसा ही किया पर उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं थी । मै इतना ही समझ पाया कि वह नृत्य शिव वंदना से जुड़ा है।
कुमाराकॉम में, एक पक्षीशाला है। इस श्रंखला की अगली कड़ी में वहीं घूमने चलेंगे।
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ताज गार्डन रिट्रीट कुमाराकॉम में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। इस चिट्ठी में सिख और अंग्रेज दंपत्ति से मुलाकात और महिला सशक्तिकरण के एक दूसरे रुप की चर्चा है।
कुमाराकॉम में, हमारी मुलाकात एक सिख दंपत्ति से भी हुई। वे शिकागो में रहते हैं और अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि वे दादा-दादी बन गये हैं और भारत घूमने के लिए आये हुए हैं। सिख महिला ने बताया,
‘हम एल्लपी से आये हैं। यह सफर हमने कल रात नाव पर किया। रात में नाव, झील के बीचो बीच रूक गयी थी। अगले दिन मैं तो सुबह पांच बजे ही उठ गयी थी लेकिन नाव को चलाने वाले ६:३७ पर उठे। इसलिये चलने में देर हो गयी।'
मैंने उससे पूछा,
‘उस समय कितने सेकेंड हुए थे।‘
पहले तो उस महिला को मज़ाक समझ में नहीं आया कि मैं यह क्यों पूछ रहा हूं। फिर वह समझ गयी कि उसने ६:३७ मिनट कहा था। इसलिए उससे सेकेंड के बारे में पूछा जा रहा है। वह मुस्कुरा कर बोली,
‘उस वक्त ४२ सेकण्ड हुये थे।‘
हमें लगा कि रात को नाव से चलना ज्यादा रोमांचकारी होता पर हम तो यात्रा शुरू कर चुके थे और अब उसमें बदलाव संभव नहीं था।
यहां हमारी मुलाकात एक अंग्रेज दंपत्ति से भी हुई। अंग्रेज महिला ने सलवार, कुर्ता पहन रखा था। मैंने उस महिला से कहा कि वे सलवार, कुर्ता में बहुत ही सुन्दर लग रही है। उसने मुस्कुरा कर कहा,
‘मैं १९७२ से लगातार भारत आ रही हूं। यहां इसी वेषभूषा को पहनना सुविधाजनक है। आप दूसरे से अलग नहीं लगते और आप इसे पहनकर किसी भी मंदिर में आसानी से जा सकते हैं।‘
मैंने कहा कि क्या लोग आपको देखकर नहीं पहचान पाते हैं क्योंकि आप देखने में भारतीय नहीं लगती हैं। उसने कहा,
‘ऐसी बात नहीं है। एक बार मैंने साड़ी पहनी थी। लोग मुझे कश्मीरी समझ गये थे। लेकिन जब मैं चलने लगी तब वह समझ गये कि मैं भारतीय नहीं हूँ क्योंकि मुझे साड़ी पहनकर चलना नहीं आता है। मैं लम्बे-लम्बे कदम रख रही थी जब कि भारतीय महिलाएं साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।‘
उसके पति ने मुझे बताया कि वह एक एरिक्सन कम्पनी में इंजीनियर थे। अब वे अवकाश प्राप्त हो गये हैं। उन्हें भारत से प्रेम हैं इसलिए वे हर साल यहां आते है। मैं, उनसे जीएसएम, सीडीएमए तकनीक और मोबाइल फोन के बारे में के बारे में बात करने लगा। थोड़ी देर बाद उनकी पत्नी ने अपने हाथों की हथेली को अजीब तरह से खोलना और बंद करना शुरू कर दिया मेरी समझ में नही आया कि वह ऐसा क्यों कर रही हैं। लेकिन, उसे देखकर उनके पति चुप हो गये। महिला ने बताया कि,
‘हम लोग एक मस्ती के लिए भारत आये हैं इस समय कोई व्यापार या काम की बात नहीं की जा सकती है। जब मेरे पति व्यापार या काम सम्बन्धी बातें करना शुरू कर देते है तो मै उनको इस तरह से इशारा से मना करती हूं। जब इसके बाद भी वह नहीं मानते तब मैं उन्हें पैर से ठोकर देती हूं। तब उनके समझ में आ जाता है कि इस तरह की बाते नहीं करनी है।‘
उनके पति ने इसका प्रतिवाद किया,
‘मैं कोई भी व्यापार या काम की बात नहीं कर रहा था हम तो केवल तकनीक के बारे में सूचना साझा कर रहे थे।‘
लेकिन उन्होनें इस विषय पर बात करना बंद कर दिया। महिला सशक्तिकरण का एक रूप यह भी है।
इस श्रंखला की अगली कड़ी में जब हम मिलेंगे तब बात करेंगे ऑस्ट्रेलिया से आयी दो महिलाओं की और महिला सशक्तिकरण के एक और रूप की।
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ताज गार्डन रिट्रीट कुमाराकॉम में महिला सशक्तिकरण के कई रुप देखने को मिले। इस चिट्ठी में उनमें से एक रूप की चर्चा है।
सुबह के समय अप्रवाही जल से कुमाराकॉम का दृश्य
ताज गार्डन रिट्रीट होटल पहुंचते ही हमारा स्वागत नारियल की माला पहनाकर किया गया। एक ताजा नारियल, जल पीने के लिए दिया गया। उस समय वहां तीन युवतियां भी आयी। वे भी वहीं ठहरी हुई थीं। हमें देखकर उन्होंने कहा कि हमारा ऐसा स्वागत क्यों नहीं हुआ। स्वागत कक्ष में बैठी युवती कुछ परेशानी में पड़ गयी। मैने उसके बचाव में कहा,
‘हम दोपहर को आये हैं, गर्मी है- इसलिये हमारा इस तरह से स्वागत हुआ है।'
उसमें से एक युवती ने कहा,
‘हम भी कल दोपहर को आयें थे फिर भी हमारा इस तरह से स्वागत नहीं हुआ।'
मैंने बात टालने के लिये कहा,
‘अरे, मुझे यह मालूम होता तो कोई और बहाना बनाता।‘
वे मतलब समझ गयी। इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।
इन महिलाओं को जब पता चला कि हम उत्तर भारत से हैं तो उनमें से एक बोली,
‘क्या आप सक्सेना है। मेरे पति भी सक्सेना है, और वहीं से है। लगता है कि सक्सेना लोग वहीं पाये जाते हैं।‘
मैंने कहा,
‘सक्सेना, कायस्थ होते हैं और उत्तर भारत में शायद ज्यादा तादाद में हैं इसलिये आपको ऐसा लगता है पर मैं सक्सेना नहीं हूं।‘
यह तीनों अपने तीस के या फिर चालीस के दशक में थी। इनसे बात करने पर पता चला कि यह बम्बई से आयी हैं और विज्ञापन कम्पनी में काम करती हैं।
इन तीनों के साथ इनका परिवार नहीं था। वे अपने पतियों और परिवार को छोड़कर सहेलियों के साथ मस्ती मारने आयी थीं। मुझे यह बात कुछ अजीब लगी।
परिवार के बारे में पूछने पर बताया बच्चों के स्कूल हैं, पति काम पर हैं और बच्चों की देखभाल भी कर रहे हैं। इस कारण उनके परिवार उनके साथ नहीं आ सके।
यह महिलायें ज्यादा समय अपने कॉटेज़ में रहती थीं। मैं भी वहां की शान्ति और सुन्दरता में इतना व्यस्त रहा कि इनके चित्र नहीं खींच पाया। इसलिये पोस्ट नहीं कर पा रहा हूं।
होटेल में श्यनकक्ष के अन्दर
महिला सशक्तिकरण का यह रूप भी देखा - पुरुष काम के साथ बच्चों को देखे और महिलाएं अपनी सहेलियों के साथ मस्ती करें :-) मैं आज तक, कभी भी अपने परिवार को छोड़कर, मौज मस्ती मारने नहीं गया। जब भी गया मेरा परिवार मेरे साथ रहा। ऐसे मौकों पर, जब तक मेरी मां जीवित रहीं, वे भी हमारे साथ रहती थीं। मेरे विचार से, ऐसे मौकों पर अगली पीढ़ी को साथ रखना चाहिये। इससे न केवल, वे बहुत कुछ सीखते हैं पर परिवार में संबन्ध भी प्रगाढ़ होते हैं।
लेकिन, यह भी सच है कि कभी-कभी, केवल मित्रों के साथ मस्ती मारने का अलग मज़ा है। अगली बार मुलाकात करेंगे एक अंग्रेज दंपत्ति से और देखेंगे महिला सशक्तिकरण का एक दूसरा रूप।
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सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
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यह मेरी कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा की पहली कड़ी है।
मुझे त्रिवेन्द्रम में होली के आस-पास कुछ काम था। मुझे लगा कि यह बहुत अच्छा मौका है कि जब हम होली में उत्तर भारत से दूर रह सकते हैं और केरल घूम सकते है। इसीलिए हम लोगों ने ऎसा प्रोग्राम बनाया कि मैं त्रिवेन्द्रम में अपना काम कर सकूं और हम केरल भी घूम सकें।
हम लोग दिल्ली से, हवाई जहाज के द्वारा कोचीन के लिए चले। शाम का समय था। दाहिने तरफ की खिड़की से, पश्चिम दिशा में, डूबता हुआ सूरज दिखाई पड़ रहा था और क्षितिज पर लाल सी पंक्ति दिखाई पड़ रही थी ऎसा लगता था कि क्षितिज में चारो तरफ आग लगी हुई है।
उस समय आकाश में केवल एक ही तारा चमक रहा था और बहुत देर बाद अस्त हुआ। मेरे विचार मे वह शुक्र (venus) ग्रह था। वह तारा हमको अपने कस्बे में काफी नीचे दिखाई पड़ता है पर यहां ऊंचाई पर था। शायद, यह इसलिए था कि हम हवाई जहाज में बहुत ऊपर थे।
हम लोग हवाई जहाज पर दिल्ली से कोचीन गये। रास्ते में, एक महिला ने इस बात की घोषणा की। उसने जानकारी दी कि,
यह दिन, किस प्रकार से लोगों को महिलाओं का सम्मान व आदर करने की याद दिलाता है।
वे चाहते हैं कि महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से देखा जाय।
कुछ समय बाद मेरी मुलाकात एक परिचायिका से हुई। मैंने पूछा क्या उसने महिला दिवस के बारे में घोषणा की है। उसने कहा,
'यह घोषणा मैंने नहीं पर हवाई जहाज की महिला चालक ने की थी। उसने भी, यह अपने मन से नहीं कहा था पर उसे कम्पनी के तरफ से जो सामग्री दी गयी थी उसे केवल पढ़ा था।'
मैंने कहा कि लेकिन जो पढ़ा था क्या उसमें यह क्यों नहीं बताया गया था कि महिला दिवस क्यों शुरू हुआ क्योंकि और यह रोचक है। परिचायिका ने कहा,
'यदि आपको इसके बारे में मालुम है तो बतायें।'
यूरोप के बहुत सारे देशों में, महिलाओं को वोट देने का अधिकार बीसवीं शताब्दी में, द्वितीय विश्वयुद्व के बाद ही मिला।
मैंने उसे बताया, कि महिला दिवस, बीसवीं शताब्दी के शुरू में, महिलाओं को वोट का अधिकार दिलवाने के लिये शुरू किया गया था। परिचायिका को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उसने पूछा,
'क्या कभी ऎसा भी था जब महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था?'
मैंने उसे बताया कि बीसवीं शताब्दी में अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था और यूरोप के बहुत सारे देशों में तो यह बीसवीं शताब्दी में, द्वितीय विश्वयुद्व के बाद ही मिला। इंगलैंड में भी उन्नीसवी शताब्दी में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था। उन्हे भी यह अधिकार बीसवीं शताब्दी में, १९१८ में मिला।
६ मई १९१२ को न्यू यॉर्क में वोट के अधिकार के लिये जलूस निकालती महिलायें - चित्र विकिपीडिया से।
मैंने उसे यह भी बताया कि दुनिया में पहले महिलाओं को व्यक्ति नहीं माना गया (विस्तार से यहां और यहां पढ़ें)। सबसे पहले महिलाओं को व्यक्ति इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना उन्होंने यह कॉर्निया सौरबजी नामक महिला को १ अगस्त १९२१ में वकील के रूप में पंजीकृत कर किया। यह कार्य, हाऊस आफ लार्ड ने १९२८ में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के लगभग सात साल बाद, किया।
हम लोग साढ़े आठ बजे तक कोचीन पहुंचे। हम लोगो को रात कोचीन में ही बितानी थी और अगले दिन कुमराकॉम जाना था।
हम लोगों ने घूमने का पैकेज 'इन्टर साइट टूरस् एवं ट्रैवल्स्' कम्पनी से लिया था। उनकी तरफ से हवाई अड्डे पर हमें प्रवीन लेने आये थे। इस ट्रवैल कम्पनी और प्रवीन के बारे में अगली बार।
कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।।
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