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लाल धब्बों की कहानी - महिलाओं की जुबानी

चिट्ठी में रजोधर्म के बारे समाज में अज्ञानता का वर्णन है और 'मेरी छोटी सी लाल किताब' (My Little Red Book) की समीक्षा है।

कुछ समय पहले डेसमंड मॉरिस ने डिस्कवरी चैनल पर 'मानव लिंग' (The Human Sexes) नामक एक श्रंखला निम्न पांच भागों में की थी।

  1. Different but Equal
  2. The Language of the Sexes
  3. Patterns of Love
  4. Passages of Life
  5. The Maternal Dilemma
प्रत्येक भाग में भी कई कड़ियां थीं। पहले भाग में बताया गया था कि महिला और पुरुष भिन्न पर एक दूसरे के बराबार हैं - किसी में महिलायें आगे हैं तो किसी में पुरुष। इस श्रंखला के पहले भाग की पहली कड़ी देख सकते हैं। इसकी कई अन्य कड़ियां भीं अन्तरजाल पर उपलब्ध हैं और देखने योग्य हैं।

महिलाओं और पुरुषों में बहुत कुछ भिन्नता तो सदियों से दोनो को अलग अलग कार्य करने के कारण या उनके लालन पालन में है पर कुछ भिन्नता जैविक भी है। जैविक भिन्नता का सबसे पुख्ता सबूत रजोधर्म (Menstruation) है। लेकिन जब अब पुरुष भी बच्चे पैदा करने लगे तो शायद यह भिन्नता भी नहीं रहे।

अधिकतर सभ्यताओं में, महिलाओं को रजोधर्म के समय अपवित्र माना गया। वे इसके दौरान न तो खाना बना सकती थी न ही पूजा कर सकती थीं। मेरे विचार में यह बीते हुऐ कल की बात है और आज ऐसा नहीं समझा जाता है। मैं, यह इसलिये सोचता था क्योंकि मैं एक सयुंक्त परिवार में बड़ा हुआ हूं। हमारे परिवार में चाचियां, बहनें, भाभियां थीं पर मुझे कभी भी पता नहीं चलता था कि वे कब इस दौर से गुजर रहीं हैं। मेरे परिवार में महिलाओं के साथ कभी भी रजोधर्म के समय उनसे कोई अन्तर नहीं किया गया।

लगता है कि, मेरी सोच सही नहीं है। रजोधर्म के बारे में लोगों की अज्ञानता समाप्त नहीं हुई है।

मैंने कुछ दिन पहले 'आज की दुर्गा - महिला सशक्तिकरण' की कहानी कई कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर लिखी थी। इसे बाद में संकलित कर इसी नाम से अपने चिट्ठे लेख में यहां प्रकाशित किया है। इस श्रंखला की एक कड़ी, महिलाओं में रजोधर्म (Menstruation) से संबन्धित थी। इसमें मैंने सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का जिक्र किया था जिसमें इसके बारे में सूचना को एकान्तता के अन्दर बताया गया था। किसी को इसके बारे में सूचना मांगना अनुचित कहा गया। मेरे विचार से, इस तरह की सूचना मांगना, अज्ञानता की निशानी है।

कुहू जी, मुझे अन्तरजाल पर मिली थी। मैंने उनका परिचय, अपनी चिट्ठी 'अंतरजाल पर हिन्दी कैसे बढ़े' में करवाया था। उन्होंने कुछ दिन पहले अंग्रेजी में 'The Red Coloured Blues' और हिन्दी में सुनो, सुनो एक बात सुनो नामक चिट्ठी लिखी है। वे एक शादी में चेन्नई गयी हुई थीं। वहां रजोधर्म के दौरान क्या हुआ यह इस चिट्ठी में लिखा है। उन्हें एक कोने में बैठा दिया गया। उनके खाने के बर्तन बदल दिये गये। यह मुझे अविश्वसनीय लगता है। मैं सोच ही नहीं सकता कि आधुनिक भारत में इस तरह का बर्ताव हो सकता है।

मेरे कुछ मित्रों की पत्नियां रजोधर्म के दौरान कम काम करती हैं। उनके मुताबिक उन्हें कमजोरी रहती है। हो सकता है कि यह सच न हो और सच कुछ और ही हो क्योंकि मुन्ने की मां के मुताबिक इस दौरान कोई भी कमजोरी नहीं होती है। यह केवल मनोवैज्ञानिक है पर इसके अतिरिक्त मैंने, समाज में, रजोधर्म के समय महिलाओं के साथ बर्ताव में कोई अन्तर नहीं पाया। ।

आज जब मैं रजोधर्म के बारे में बात कर रहा हूं तो इस संबन्ध पर एक पुस्तक का जिक्र करना चाहूंगा। रैशल कॉंडर नालेबफ (Rachel Kauder Nalebuff ) ने एक पुस्तक 'मेरी छोटी लाल किताब' (My Little Red Book) (माई लिटल रेड बुक) नाम से लिखी है। इसमें उन्होंने ९२ युवतियों के पहले रजोधर्म के संस्मरण लिखें है।

'मेरी छोटी लाल किताब' में एक संस्मरण बैंगलोर की युवती का है जो कुहू जी की चिट्ठी में वर्णित व्यवहार की तरह है। इस पुस्तक में कुछ अजीब तरह के अनुभवों को बांटा गया है। यह पुस्तक, शायद पुरुषों को रुचिकर न लगे पर महिलाओं को अवश्य भायेगी। यह पुस्तक हर युवती को पढ़नी चाहिये। शायद पुरुषों को भी - वे उनकी मुश्किलों को, उनके साथ होते अन्याय को, ज्यादा अच्छी तरह समझ सकेंगे।

यदि आप इस पुस्तक के बारे में इसकी लेखिका रैशल से जानना चाहते हैं तो यहां सुन सकते हैं।

इस तरह का व्यवहार अज्ञानता के कारण होता है। रजोधर्म के बारे में अज्ञानता, अथार्त यौन शिक्षा का आभाव। रजोधर्म के बारे में अज्ञानता के बारे में मैंने अपनी चिट्ठी यौन शिक्षा में भी जिक्र किया है। लोग अक्सर यौन शिक्षा का सही अर्थ नहीं जानते हैं और उसकी निन्दा करते हैं। यौन शिक्षा का सही मतलब इस तरह की अज्ञानता को दूर करना है।

महिलाओं के साथ, इस तरह का व्यवहार, न केवल यौन शिज्ञा के महत्व को उजागर करता है पर इसकी जरूरत को भी दर्शाता है।

हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
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is post per, smaaj mein rjodharm ke bare agyaanta ka varan hai aur meri chhotee see lal kitaab kee smeeksha hai. yeh hindi (devnagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post talks about wrong practises about menstruation and reviews 'My Little Red Book'. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.



सांकेतिक शब्द

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क्या, अंतरजाल तकनीक पर काम करने वालों पर, वाई क्रोमोसोम हावी है?

ऑस्ट्रेलिया की सबसे बड़ी अदालत, वहां का उच्च न्यायालय है। न्यायमूर्ति माइकेल किरबी वहां न्यायधीश हैं। इस समय, वे विश्व में, कानून के क्षेत्र में सबसे ज्यादा जाने माने व्यक्ति हैं।

न्यायमूर्ति किरबी

२१ फरवरी २००८ को, इंटरनेट इंडस्ट्री एसोसिएशन का वार्षिक रात्रि-भोज था। न्यायमूर्ति किरबी वहां मुख्य अथिति थे। वहां पर भाषण देते समय उन्होने इस बात पर गौर किया कि सुनने वालों में अधिकतर व्यक्ति पुरुष थे। उनके मुताबिक यदि वे किसी और पेशे के लोगों के बीच भाषण दे रहे होते तो उसमें पुरुषों और महिलाओं की संख्या लगभग बराबर होती। वे आगे कहते कि,
'My conversationalist said, it all goes back to the fact that to be good in this type of technology, you have got to have that very strange mental quirk. And that’s a male phenomenon. It’s on the Y chromosome, in the male genes. That’s probably why they are mostly men here.
I don’t know that I accept that.
...
But it’s a thing for you to look to. Women are the great networkers. And toilers in the Internet are in the business of the greatest network of them all.'
लोगों का कहना है कि इस तकनीक में अच्छा होने के लिये एक खास तरह का दिमाग होना चाहिये और यह पुरुषों के पास - वाई क्रोमोसोम के कारण - है। शायद इसी लिये आज अधितर व्यक्ति, पुरुष हैं।
मै इस बात को नहीं मानता हूं।
...
लेकिन इस पर गौर करने की जरूरत है क्योंकि महिलायें बहुत बेहतरीन नेटवर्कर होती हैं और आप दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में काम काम करते हैं।
इसे आप स्वयं सुन सकते हैं। यह उनके भाषण का आखरी भाग है। यह बात इसके अन्त में है। यदि आप इसके पहले भाग भी सुनना चाहें तो यहां, यहां, यहां, यहां, और यहां सुन सकते हैं।



मैं न्यायमूर्ति किरबी की बात से सहमत हूं। मुझे भी यह बात सही नहीं लगती की अंतरजाल की तकनीक में अच्छा होने के लिये वाई क्रोमोसोम का कोई महत्व है पर यह भी गौर करने की बात है कि इस पेशे में पुरुषों की संख्या अधिक है। यह नहीं होना चाहिये।

कुछ दिन पहले शोभा डे ने एक लेख लिखा था कि कैसे एक पत्रकार यूवक ने, अपनी मां को, अपने समलैंगिक होने के बारे में बताया था। मेरे विचार से वह सही नहीं कह रही थी क्योंकि कोई यूवक इतना क्रूर नहीं हो कता। मैंने इस पर, आक्रोशवश, अपने चिट्ठे छुटपुट पर, मां को दिल की बात कैसे बतायें नामक चिट्ठी लिखी थी। आप यह सब वहां जा कर पढ़ सकते हैं।

न्यायमूर्ति किरबी भी समलैंगिक हैं। उनहोने अपनी मां को कभी नही बताया कि वे समलैंगिक हैं। उनके मुताबिक वे जो हैं, जैसे हैं, वह ईश्वर के कारण है। इसमें उनका कोई दोष नहीं पर उनकी मां यह नहीं समझ पाती और यह पता चलने पर उन्हे बहुत दुख होता। उनकी मां अपने को ही दोषी ठहरातीं। चूंकि वे अपनी मां को दुख नहीं देना चाहते थे इसलिये यह बात गुप्त रखी। आज उनकी मां जीवित नहीं हैं। इसलिये वे सच बात को छुपाने का कोई औचित्य नहीं समझते है।

मेरे विचार से, जो व्यक्ति दूसरे की भावनाओं को समझता है, आदर करता है, परिपक्व होता है - वही इस तरह की बात कह सकता है।

हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
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  • अंतरजाल की माया नगरी की नवीनतम कड़ी: नैपस्टर केस
  • पुस्तक समीक्षा: माइक्रोब हंटरस् - जीवाणुवों के शिकारी (Microbe Hunters by Paul de Kruif)
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बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले।

इस चिट्ठी का चित्र विकीपीडिया से है और ग्नू स्वतंत्र अनुमति पत्र की शर्तों के अन्तर्गत प्रकाशित किया गया है।

इस पोस्ट पर न्यायमूर्ति माइकेल किरबी के द्वारा २१ फरवरी २००८ को इंटरनेट इंडस्ट्री एसोसिएशन का वार्षिक रात्रि-भोज दिये गये भाषण की चर्चा है। यह हिन्दी (देवनागरी लिपि) में है। इसे आप रोमन या किसी और भारतीय लिपि में पढ़ सकते हैं। इसके लिये दाहिने तरफ ऊपर के विज़िट को देखें।

is post per justice miachael kirby ke dvaraa 21 February 2008 ko internet industry association ke ratri bhoj per diye gaye bhaashan ki charchaa hai. yah hindi (devnagri) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is about - a cooment made by by Justice Miachael Kirby on 21st February before Internet Industry associatio. It is in Hindi. You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द
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यौन शिक्षा और सांख्यिकी

कुछ दिन पहले शास्त्री जी ने यौन शिक्षा पर एक लेख 'यौन शिक्षा — पाश्चात्य राज्यों का अनुभव क्या कहता है ?' लिखा। मैंने इस पर टिप्पणी की,
'शास्त्री जी आप गलत नहीं कहते पर फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि सांख्यिकी का पहला सिद्धान्त है There are lies, damned lies and statistics. इसका कारण है।
आप सांख्यिकी को जिस तरह से चाहें, प्रयोग कर सकते हैं और वह विश्वसनीय लगता है। सांख्यिकी का प्रयोग सही है या गलत - केवल विशेषज्ञ ही बता सकते हैं। मान लीजिये मैं कहूं कि 'क' टूथपेस्ट अच्छा है क्योंकि इससे मंजन करने वालों में ९०% लोगों के दांत अच्छे रहते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि यह अच्छा टूथपेस्ट है क्योंकि हो सकता है इससे न मंजन करने वालों में से ९५% के दांत अच्छे रहते हों। यदि ऐसा है तो यह खराब टूथपेस्ट हो जायगा।
सोचिये यदि पाश्चात्य देशों में यौन शिक्षा न हुई होती तो क्या हाल होता। यदि तब हाल अच्छे होते तब ही आपकी बात ठीक लगती है अन्यथा नहीं।
अपने देश में जिस तरह के टीवी प्रोग्राम आते हैं जिस तरह की खबरे आती हैं, जिस तरह अंतरजाल पर सब उपलब्ध है - उसे देख कर तो मुझे लगता है कि यौन शिक्षा होनी चाहिये।
इस बारे में मैंने अपने तथा अपने परिवार के व्यक्तिगत अनुभव भी 'यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है' और 'यौन शिक्षा' नाम से लिखे हैं। मैं चाहूंगा इनको भी आप देखें फिर राय कायम करें।
ऐसे यौन शिक्षा पर व्यापक बहस जरूरी है।'

यह टिप्पणी किसी कारणवश उस समय प्रकाशित नहीं हो पायी। उसके बाद नीरज जी ने शास्त्री जी असहमत हो कर 'यौन शिक्षा: दो टूक बातें !' नाम की चिट्ठी लिखी। जिस पर उनकी अनुमति से, मैंने यह टिप्पणी कर दी। शास्त्री जी से असहमत हो कर, पंकज जी ने भी एक चिट्ठी 'मेंढक बहरा हो गया' नाम से लिखी। शास्त्री जी इनका जवाब पांच चिट्ठियों यहां, यहां, यहां, यहां, और यहां दिया है। उनके जवाब को एकदम से नहीं नकारा जा सकता।

इस विषय पर इसके पहली लिखी चिट्ठियों की लिंक मेरी दोनो चिट्ठियों में है। यह सब इस विषय पर रोचक और ज्ञानवर्धक बहस है। यह बहस, कम से कम इन चिट्ठियों कि उन टिप्पणियों से बेहतर है जिन टिप्पणियों के द्वारा, यह कहा गया कि लोग इस विषय पर नहीं पढ़ना चाहते चाहे जितना अच्छा
लिखा हो। मेरे विचार से बहस इस तरह से होनी चाहिये न की उस तरह से जैसे अक्सर हो जाती है।

यौन शिक्षा के संदर्भ में, मैं ११-१२वीं कक्षा के विद्यार्थियों को 'फिर मिलेंगे' फिल्म देखने के लिये भी सलाह दूंगा। यदि आपने इसे नहीं देखी हो तो देखें। आप इसे अपने मुन्ने, मुन्नी के साथ देखें या अलग - यह आपके उनके रिश्तों के ऊपर है। मैंने तो यह फिल्म अपने बच्चों के साथ देखी, हांलाकि जब यह फिल्म आयी तब तक वे अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके थे।

मेरा अब भी, यह मत है,
'यौन शिक्षा - कम से कम प्रारम्भिक स्तर की - होनी चाहियेः शायद घर में सबसे अच्छी हो।'
हांलाकि न तो सब इसे ठीक प्रकार से बताने में सक्षम हैं, न ही इस पर लिखी सब पुस्तकें ठीक हैं।


यह तो बात हूई, यौन शिक्षा पर - अब चलते हैं सांख्यिकी पर।

सांख्यिकी के बारे अक्सर कहा जाता है - पहले झूट, फिर बिलकुल झूट, उसके बाद सांख्यिकी। यही बात मैंने अपनी टिप्पणी पर भी लिखी थी। इसका एक उदाहरण, टिप्पणी पर बताया था। इसको समझाने के लिये, यह भी
कहा जाता है,
'यदि आपका सर रैफ्रीजरेटर में हो और पैर जलते स्टोव पर तो सांख्यिकी के अनुसार, औसतन, आप ठीक ठाक हैं।'

यह कार्टून मैथली जी ने, इसी कहावत को उजागर करने के लिये बनाया है। मैथली जी, कौन? अरे वही कैफे हिन्दी और ब्लॉगवाणी वाले - मेरा धन्यवाद और आभार।

किसी और संदर्भ में, मैथली जी के बारे में, मैंने दो चिट्ठियां - 'डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी' और 'हिन्दी चिट्ठाकारिता, मोक्ष, और कैफे हिन्दी' नाम से लिखी हैं।


मैंने, सांख्यिकी, ४० वर्ष पहले अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़ी थी। उसके बाद कभी जरूरत नहीं पड़ी। यह टिप्पणी लिखते समय मैंने अपने विद्यार्थी जीवन को याद किया और याद किया उस समय सांख्यिकी पर पढ़ी कई बेहतरीन पुस्तकों को, जो आज भी सांख्यिकी की लाजवाब पुस्तकें मानी जाती हैं। अगली बार, उन्हीं के बारे में बात करेंगे।

यौन शिक्षा और सांख्यिकी

यौन शिक्षा

यह लगभग २० साल पहले की बात है। मुन्ना स्कूल में पढ़ता था। उसका सबसे अच्छा दोस्त, एक मुस्लमान लड़का, अब्दुल (नाम बदल दिया है) हुआ करता था। उस समय हमारे कस्बे में हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो गया - गोली और बम भी चले। घर में बहस के दौरान मैंने गोली और बम चलाने वालों के खिलाफ बात की। मुन्ने ने कहा,
'पापा तुमको यह देखना चाहिये कि गलती किसकी है, किसने बवाल शुरू किया। तुम तो बस गोली चलाने वालों की आलोचना कर रहे हो। यह तो देखो गलती किसकी है।'
मेरा जवाब था,
'गलती किसकी है, कैसे हुई - यह इसलिये जरूरी है कि आगे इस तरह का हादसा न हो पाये पर इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात गोली और बम का रोका जाना। गोली और बम चलाने वाले यह नहीं देखते कि वे किस पर चला रहें हैं। गलती कोई करता है गोली और बम किसी और को लगती है। हो सकता है कि अगली गोली तुम्हारे मित्र अब्दुल को लगे तो तुम क्या कहोगे या तुम को लगे तो अब्दुल क्या कहेगा।'
मुन्ने ने प्रतिवाद नहीं किया। बाद में, वह मेरी बात का समर्थन करने लगा। आप यह सोच रहें होंगे कि इस घटना का इस शीर्षक से क्या संबन्ध है। बताता हूं धैर्य रखिये।

यौन शिक्षा के बारे में बात करने से पहले, दो शब्द तसलीमा नसरीन के बारे में।

तसलीमा नसरीन एक जानी मानी शख्सियत हैं। मैं उन्हें नहीं जनता हूं, न ही कभी मिलने का मौका मिला है। समयाभाव के कारण, मैं उनके द्वारा लिखा कोई लेख या पुस्तक अभी तक नहीं पढ़ पाया हूं - समय मिलते ही जरूर पढ़ना चाहूंगा। अब चलते हैं यौन शिक्षा पर और चर्चा शुरु करते हैं शोभा नरायन के टाईम पत्रिका के ११ जून २००७ के अंक में निकले 'द पेरेंट ट्रैप' नाम के लेख से।

शोभा नरायन एक लेखिका हैं। उन्होनें 'मानसून डायरी' नामक एक चर्चित पुस्तक लिखी है। वे दो बेटियों की मां हैं। टाईम पत्रिका में लिखे लेख में, वे इस बात पर चिन्ता प्रगट कर रही हैं कि वे कब और किस तरह से अपनी बेटियों को समाज पल रहे यौन भक्षक भेड़ियों के बारे में बतायें। वे इसमें भारत सरकार के द्वारा १३ राज्यों मे किये सर्वेक्षण के नतीजों के बारे में बता रहीं हैं जिसमें यह बताया गया है कि भारत में हर दो बच्चों में से एक बच्चा यौन प्रताणना का शिकार है। वे उसमें उस सर्वेक्षण के बारे में भी बताती हैं जिसमें यह पाया गया है कि अधिकतर बलात्कार तथा यौन प्रताणना जान पहचान के व्यक्ति के द्वारा ही की जाती है। इस विषय पर राय कायम करने के पहले इस लेख को भी पढ़ें।

यौन शिक्षा का विरोध करने वाले, इसका अर्थ केवल संभोग, या फिर जनन समझते हैं। यह ठीक नहीं है।

संभोग, जनन - यौन शिक्षा का एक विषय है पर यौन शिक्षा में उसके अतिरिक्त बहुत कुछ और है जो कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। उदाहरणार्थ, यौवनारंभ (age of puberty) के समय लड़के और लड़कियों में न केवल शारिरिक, पर भावनात्मक परिवर्तन भी होते हैं। लड़के अक्सर जिद्दी हो जाते हैं, बात नहीं सुनते। कई लड़कियों को रजोधर्म (menstruation) के शुरु होते समय बदन में ऐंठन (cramp), जीवन में उदासी, खिन्नता, निराशा (depression) होने लगती है। कईयों को यह नहीं भी होता है। यह प्राकृतिक है। यह न केवल लड़के और लड़कियों को समझना चाहिये पर उनके घरवालों को भी। मैंने केवल एक उदाहरण दिया है, इस तरह का बहुत कुछ यौन शिक्षा के अंदर आता है जिसका संभोग या जनन से कोई सीधा संबन्ध नहीं।

'हमने जानी है जमाने रमती खुशबू' श्रंखला के अन्दर 'यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है' चिट्ठी में मैंने यह बताने का प्रयत्न किया कि कैसे यौन शिक्षा मुझे मिली या कैसे मैंने इसे अगली पीढ़ी को दी। इसके बाद संजय जी ने 'बाल यौन-शोषण पर अन्यथा' नाम की चिट्ठी लिखी। मैंने टिप्पणी की,
' अपने लेख में यौन शोषण और परिवार में यौन उत्पीड़न के बारे में दबी जबान से लिखा है। यह उससे कहीं ज्यादा है जिसे समाज स्वीकार करना चाहता है।
बाल यौन शोषण में अक्सर चरम सीमा पहुंचने के बाद बच्चों की मृत्यु हो जाती है। निठारी में बच्चों की मृत्यु का सबसे संभावित कारण यही है। इसके लिये बड़े जिम्मेवार हैं क्योंकि उन्हें यौन शिक्षा ठीक से मिली नहीं।
यदि कोई अध्यापक विषय को ठीक से न पढ़ा पाये तो गलती अध्यापक की है न कि विषय की।'


मैं इसके बाद संजय जी की चिट्ठी में बतायी गयी पत्रिका अन्यथा पर भी गया, उसके लेख पढ़े। इसमें एक लेख 'यौन शोषण की समस्या और हिन्दी कथा साहित्य' पर है। यह लेख तसलीमा नासरीन की कविता से शुरू होता है।
'मैंने उस दिन रमना में देखा एक लड़का / लड़की खरीद रहा है
मेरी भी वही इच्छा होती है/ एक लड़का खरीद लाऊँ।
पेट गरदन पर गुदगुदी दे कर हसाऊं/ घर ले आऊँ और हील वाली जूती से/
ताबड़तोड़ कर पीट कर छोड़ दू/ जा साले!
.............................................
मेरी बड़ी इच्छा होती है लड़का खरीदने की
जवान जवान लड़के/ छाती पर उगे घने बाल
उन्हें खरीदकर पूरे तरह से रौंद कर
सिकुड़ अंडकोश पर जोर से लात मार कर कहूं/ भाग स्याले।'
(तसलीमा नसरीन की कवितायें 'उल्टा लेख' पृ. ७६)

मैंने कई बार सोचा कि इस कविता को अपने चिट्ठे पर न लिखूं और केवल लिंक दे दूं पर शायद इसको प्रकाशित किये बिना मेरी बात पूरी न हो पाती इसलिये बहुत हिम्मत कर इसे प्रकाशित किया है। इसके लिये चिट्ठाकार बन्धु माफ करेंगे।

मैं नहीं जानता कि यह कविता जानी मानी शख्सियत तसलीमा जी की कविता है या किसी और की। मैं यह भी नहीं जानता कि यह किसी कविता का भाग है कि पूरी कविता। मैं नहीं कह सकता कि यह किस संदर्भ में लिखी गयी है। मैं आशा करता हूं कि इस कविता का वह अर्थ नहीं होगा को कि उद्धरित भाग से लग रहा है।

कहा जाता है कि कवितायें, चित्रकारी, कल्पना शक्ति, गुमान, fantasy, अवचेतन मस्तिक्ष की दबी इच्छायें होती हैं। मेरे विचार से यौन शिक्षा की एक महत्वपूर्ण भूमिका यह भी है कि लोग यह भी समझ पावें कि,
  • महिला या बालिका शोषण का हल, बालक शोषण नहीं है। बालक भी, उतने ही यौन शोषण के शिकार होते हैं जितना कि बालिकायें या फिर महिलायें।
  • बच्चों को ही नहीं पर बड़ो को भी यौन शिक्षा की जरूरत है। हां पहले ठीक से मिली हो तो शायद फिर जरूरत पड़े।

बस इसलिये मुझे २० साल पहले की घटना याद आ गयी। गलती किसी की और सजा किसी नादान को।

इस चिट्ठी में, मैंने, अपने विचार रखने का प्रयत्न किया है। मेरा मकसद किसी की भावनायें आहत करने का या दुख पहुंचाने का नहीं है। अज्ञानवश यदि किसी की भावनायें आहत हुई हैं या दुख पहुंचा हो, तो क्षमा करेंगे।

यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है: हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू

यहां पर ही क्यों, सेक्स पर बात करना हर जगह वर्जित है। हांलाकि कि बीबीसी के मुताबिक बहुत कुछ बदल रहा है। हिन्दी चिट्ठा-जगत में कुछ दिन पहले 'सेक्स क्या' नामक चिट्ठे को नारद पर रखने या नहीं रखने के लिये बहस चली जिसकी आखरी कड़ी रजनीश जी ने लिखी है। सी.बी.एस.ई. में यौन शिक्षा को पाठ्य-क्रम में रखा गया है। इसे कई राज्य सरकारों ने मना कर दिया। इस संबन्ध पर कईयों ने यहां (यह चिट्ठा अब सबके पढ़ने के लिये नहीं रहा), यहां, यहां, यहां, और यहां लिखकर अपनी राय दी है। मैं यौन शिक्षा का पक्षधर हूं। मेरे विचार से यौन शिक्षा को पढ़ाया जाना ठीक है।

यौन शिक्षा - इस रिश्तों की श्रखंला में! आपको कुछ अजीब लग रहा है न। चलिये पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि यह चिट्ठी इस श्रंखला के अन्दर क्यों लिख रहा हूंं?

महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा छेड़खानी भीड़-भाड़ की जगह होती है पर यौन उत्पीड़न सगे संबन्धी या जान पहचान व्यक्ति के द्वारा ही ज्यादा होता है। पारिवारिक रिश्तों के अन्दर, यौन शिक्षा किस तरह से हो, एक नाजुक पर महत्वपूर्ण विषय है। इसीलिये मैं, इसे, इस श्रंखला के साथ लिख रहा हूं।

मैं नहीं जानता कि इस विषय को बताने का क्या सबसे अच्छा तरीका है पर मैं वह तरीका अवश्य जानता हूं जैसा कि हमारे परिवार में हुआ। मैंने यह विषय कैसे अपनी आने वाली पीढ़ी को बताया।

मुझे अपने काम के कारण, अक्सर स्कूल, प्रोफेशनल विद्यालय, विश्व-विद्यालय में जाना पड़ता है। बच्चों से मुलाकात होती है। अक्सर मेरे पास बच्चे यह पूछने के लिये आते हैं कि वे क्या कैरियर चुने, कहां पढ़ने जायें। मैं कभी कभी उनसे यौन शिक्षा के विषय पर भी बात करता हूं। मैं क्या उनसे बताता हूं यहां कुछ उसी के बारे में।

मेरे बचपन का एक बहुत अच्छा मित्र, टोरंटो इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापक रहा। कुछ समय पहले उसकी मृत्यु हो गयी। बचपन में ही उसके पिता का देहान्त हो चुका था। भाई, बहनो की भी शादी के बाद, वह और उसकी मां हमारे ही कस्बे में रहते थे। अक्सर उसकी मां उसके भाई या बहनो के पास रहने चली जाती थी। उस समय उसका घर खाली रहता था। उस समय, उसके घर, काफी धमाचौकड़ी रहती थी।

यह १९६० का दशक था। हेर संगीत नाटक का मंचन हो चुका था। इसका जिक्र मैंने 'ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके' की श्रंखला में किया है। हिप्पी आंदोलन अपने चरम सीमा पर था। हमारी इस धमाचौकड़ी में, अक्सर लड़कियों भी शामिल रहती थीं। कभी कभी चरस और गांजा भी चलता था। मैं खेल में ज्यादा रुचि रखता था। मुझे जिला, विश्वविद्यालय एवं अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। इसी कारण इस तरीके की धमाचौकड़ी में शामिल नहीं रहता था।

एक बार मेरे मित्र को कुछ ब्लू फिल्में मिल गयीं। एक दूसरे मित्र ने प्रोजेक्टर का इंतजाम कर दिया। उन लोगों ने फिल्म को भी देख लिया। यह सोचा गया कि उसे फिर देखा जायगा पर सवाल था कि ब्लू फिल्म कहां रखी जाय। कोई भी उसे रखने को तैयार नहीं था। मैं ही ऐसा था जो कि इस धमाचौकड़ी मे शामिल नहीं था। इसलिये मेरे पास ही रखना सबसे सुरक्षित समझा गया या यह समझ लीजये कि मुझे उन ब्लू फिल्मों को रखने में कोई हिचक नहीं थी।

मैं ने यह ब्लू फिल्में अपने कपड़े की अलमारी में रख दी। एक दिन मेरे कपड़े लगाते समय अम्मां को ब्लू फिल्में मिल गयीं। उनके पूछने पर मैंने सारा किस्सा बताया और यह भी बताया कि मैंने कोई भी ब्लू फिल्म नहीं देखी है। अम्मां ने पूछा कि मुझे सेक्स के बारे में कितना ज्ञान है। मेरा जवाब था थोड़ा बहुत। उन्होने कहा कि,

'ब्लू फिल्मों मे बहुत कुछ नामुमकिन बात होती है और अधिकतर जो भी होता है वह ठीक नहीं। तुम्हें मालुम होना चाहिये कि क्या ठीक नहीं है। इसलिये इसे, तुम्हें देख लेना चाहिये पर उसके पहले सेक्स का अच्छा ज्ञान भी होना चाहिये।'

हम लोग किताबों की दुकान पर गये और वहां से एक पुस्तक Everything you always wanted to know about sex but were afraid to ask by David Reuben खरीद कर लाये। यह पीले रंग की पुस्तक है इसलिये यह पीली पुस्तक के नाम से भी मशहूर हुई।

सेक्स के बारे में उत्तेजना चित्र देख कर होती है या इसके किये जाने के वर्णन से। यदि यह वर्णन साधारण रूप से है तो नहीं। इस पुस्तक में कोई भी चित्र नहीं हैं। इसमें सारा वर्णन प्रश्न और उत्तर के रूप में है। इसे पढ़ कर कोई उत्तेजना नहीं होती है। इस पुस्तक में कुछ सूचना समलैंगिक रिश्तों और सेक्स परिवर्तन के बारे में है। यह इस तरह के विषयों को नकारती है। इसी लिये कुछ लोग इस पुस्तक पर विवाद करते हैं। यह दोनो विषय विवादस्पद हैं। मैंने इनके बारे में 'Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री', 'आईने, आईने यह तो बता - दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन', 'मां को दिल की बात कैसे बतायें', और 'मां को दिल की बात कैसे पता चली' नाम से लिखा है। मैं इसके बारे विस्तार से लिखने की हिम्मत जुटा रहा हूं। यदि आप इस पुस्तक में इस विषय की सूचना को छोड़ दें तो बाकी सूचना के बारे में कोई विवाद नहीं है और लगभग सही है। मेरे विचार से यह एक अच्छी पुस्तक है।

मैंने, इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ब्लू फिल्म देखना जरूरी नहीं समझा। ब्लू फिल्म न देखने के निर्णय में, कई अन्य बातों ने भी महत्वपूर्ण रोल निभाया। अम्मां ने,

  • मुझे न तो उन फिल्मों को रखने के कारण डांटा, न ही देखने के लिये मना किया। जिसके बारे में मनाही हो, उसी के बारे में उत्सुकता ज्यादा रहती है;
  • हमेशा हमें ऑउटडोर खेल पर, पढ़ाई से भी ज्यादा, ध्यान देने के लिये प्रोत्साहित किया। उस समय पढ़ाई का वैसा बोझ नहीं था जैसा कि आजकल होता है।
अम्मां का प्रिय वाक्य थे
'पढ़ाई बन्द करो और बाहर जा कर खेलो।'
यदि हम रात को देर तक पढ़ते थे तो हमेशा कहती थीं
'चलो, सोने जाओ। बहुत रात तक पढ़ना ठीक नहीं।'
परीक्षा के दिनो में तो हमारे कमरे की बत्ती बहुत ज्लद ही बन्द कर दी जाती थी। वे कहती थीं,

'परीक्षा के समय दिमाग एकदम तरोताजा रहना चाहिये।'

हमार मुन्ना, जब स्कूल में ही था तब मैंंने उसे यह पुस्तक पढ़ने के लिये दी। वह बारवीं तक हमारे पास ही रहा, उसके बाद
आई.आई.टी. कानपुर पढ़ने चला गया। वहां सब होस्टल में ही रहते हैं। मैं समझता हूं कि उसे इस पुस्तक को पढ़ने के कारण मदद मिली।

देश के कुछ महाविद्यालयों में, पास-ऑउट करने वाले छात्रों की एक पत्रिका निकाली जाती है। आई.आई.टी. कानपुर में ऐसा होता है। यह पत्रिका विद्यार्थी ही निकालते हैं इसमें उनके साथी ही उन्हीं के बारे में लिखते हैं। मैं एक बार उनकी इस पत्रिका को पढ़ने लगा तो उन्होने मना किया,

'पापा, तुम मत पढ़ो। इसे पढ़ कर तुम्हे अच्छा नहीं लगेगा।'
मैंने कहा,
'मैं भी अपने विद्यार्थी जीवन में इन सब से गुजर चुका हूं इसलिये कोई बात नहीं।'
उनकी पत्रिका में बहुत सारी बातें स्पष्ट रूप से लिखी थीं। हमारे समय में भी उस तरह की बातें होती थी पर इतना स्पष्ट रूप से नहीं लिखा जाता था।

मैंने School Reunion चिट्ठी लिखते समय लिखा था कि मुन्ना आई.आई.टी. कानपुर की पत्रिका में दी गयी पहली दो सूची में नहीं है पर विद्यार्थियों की इस पत्रिका में, उसके बारे में, यह अवश्य लिखा है कि वह
वहां के साफ सुथरे बच्चों में से एक है। हो सकता है यह उसके संस्कारों के कारण हो पर मेरे विचार से यह उसके इस पुस्तक को पढ़ने और यौन शिक्षा को अच्छी तरह से समझने के कारण है।

मेरे विचार में, आने वाली पीढ़ी को अच्छी किताबें बताना, मुक्त पर स्वस्थ यौन चर्चा करना, एक अच्छी बात है। अन्यथा, नयी पीढ़ी को गलत सूचना मिल सकती है जिसकी संभावना अधिक है। इस कारण वे गलतफहमी के शिकार हो सकते हैं।


भूमिका।। Our sweetest songs are those that tell of saddest thought।। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन।। Love means not ever having to say you're sorry ।। अम्मां - बचपन की यादों में।। रोमन हॉलीडे - पत्रकारिता।। यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है।। जो करना है वह अपने बल बूते पर करो।। करो वही, जिस पर विश्वास हो।। अम्मां - अन्तिम समय पर।। अनएन्डिंग लव।। प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो।। निष्कर्षः प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।। जीना इसी का नाम है।।


सांकेतिक शब्द
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Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री

कुछ दिन पहले सुनील जी ने 'पुरुष या स्त्री ?' नाम की एक चिट्ठी पोस्ट की। उन्होने एक दूसरी चिट्ठी भी 'मैं शिव हूँ' के नाम से पोस्ट की। उसी पर संजय जी और सृजन शिल्पी जी ने टिप्पणी की। सृजन शिल्पी जी ने बाद मे 'अर्धनारीश्वर और वाणभट्ट की आत्मकथा' नाम की चिट्ठी भी पोस्ट की। मेरा मन भी था कि इन सब पर टिप्पणी करूं, फिर लगा कि एक स्वतंत्र चिट्ठी लिखना ठीक होगा। इसलिये यह चिट्ठी पोस्ट कर रहा हूं।

कुछ लोगो को प्रकृति अलग तरह से बनाती है उन्हे मस्तिष्क तो एक लिङ्ग का देती और शरीर दूसरे लिङ्ग का। इन लोगों के अपने कष्ट होते हैं सर्जरी के बढ़ते आयाम ने इन लोगों को कुछ राहत दी है। ऐसे कुछ लोग सर्जरी करा कर अपना लिङ्ग बदल सकते हैं। सेक्स परिवर्तन कराने के बाद, इन लोगों को trans-gendered कहा जाता है। इन लोगों के भी अधिकार हैं पर हमारा समाज ऐसे लोगों की पीड़ा समझना तो दूर, इनका मजाक बनाने मे भी पीछे नहीं रहता।

कुछ साल पहले की बात है कि एक टीवी बनाने वाली कम्पनी ने अपने टीवी के विज्ञापन मे एक लड़के और लड़की को एक टीवी की दुकान मे दिखाया। लड़की सुन्दर है और लड़का उससे इश्क (flirt) करने की कोशिश कर रहा है। दुकान मे अलग- अलग कम्पनी के टीवी लगे हैं। उन सब मे एक प्रोग्राम आ रहा है जिसमे एक लड़की का साक्षात्कार हो रहा है जो कि लड़के से लड़की बनी थी। लड़की का चेहरा ढ़ंका हुआ है। अलग अलग टीवी मे लड़की का चेहरा ढ़का रहता है पर जब उस कम्पनी के टीवी के सामने पहुंचते हैं तो टीवी पर लड़की का चेहरा साफ दिखायी पड़ता है। यह टीवी वाले यह बताना चाहते थे कि उनके टीवी पर तस्वीर एकदम साफ आती है। यह लड़की वही है जो कि दुकान में है। जब लड़का उसे देखता है तो घृणा से मुंह बनाते हुऐ, उस दुकान से,
लड़की को छोड़ कर, चला जाता है।

मेरे विचार से यह विज्ञापन बहुत ओछा था। यदि इस विज्ञापन से जुड़े किसी व्यक्ति के परिवार मे ऐसा कोई सदस्य होता तो वह न तो यह विज्ञापन बनाता, न ही उसे अपनी कम्पनी के लिये मंजूरी देता। परिवार मे ऐसा कोई सदस्य होने की कोई जरूरत नहीं है, इसके लिये तो ऐसे लोगों की मुश्किलों को समझने की जरूरत है जो कि इस विज्ञापन को बनाने वाले या इस टीवी कम्पनी के पास नहीं थी।

संवेदनहीन (insensitive) इन्सान ही ऐसा कार्य करते हैं। मेरे विचार मे कोई भी कार्य करने से पहले उसे अपने ऊपर रख कर सोचने की जरूरत है, कि यदि वे उस जगह होते तो उन्हे कैसा लगता। मैंने इसके बारे मे कुछ लिखा-पढ़ी की और इसके पहले कुछ और कार्यवाही करता कि यह विज्ञापन दिखायी देना बन्द हो गया। कह नहीं सकता कि लिखा-पढ़ी का असर हुआ या उन्हे स्वयं लगा कि यह गलत है।
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