धार्मिक उन्माद

कुछ लोग अपने देश भारतवर्ष को धर्म निर्पेक्ष कहते हैं तो कुछ पंथ निर्पेक्ष। मैं इस विवाद में नही पड़ना चाहता कि क्या सही शब्द है पर मै इतना जानता हूं कि हमारा संविधान सब धर्मो का आदर करता है। पर फिर भी इतने सालो बाद हमें धार्मिक उन्माद या धार्मिक पागलपन के अलावा क्या मिला। यदी मैं हुसैन होता तो सरस्वती का वह चित्र न बनाता जिस पर इतना बवाल हुआ। पर यदी चित्र बन गया था तब उस पर इतना बवाल बेकार था लोग अक्सर लीक से हट कर इसलिये काम करते हैं कि वे चर्चा में आ जायें या चर्चा में बने रहें। बवाल करके हुसैन को उससे ज्यादा महत्व दे दिया जितना उन्हे मिलना चाहिये था। इसी तरह से डैनिश व्यंगकार को पैगम्बर का कार्टून नहीं बनाना चाहिये था पर यदी बन गया तो उस पर यह पागलपन बेकार है तथा किसी सरकार के मिनिस्टर के व्दारा उस व्यंगकार के सर पर इनाम रखना; उस मिनिस्टर का सरकार में बने रहना: इस पर न तो मेरे पास उस मिनिस्टर के लिये, न ही उस सरकार के लिये कोई शब्द है।

दावतें

हमारे देश में खाने की कमी है| ज्यातर जनता को पेट भर खाने को नही मिलता है पर उच्च वर्ग के लोगों को देखें तो उनके यहां दावतें ही दावतें | अक्सर यदी शहर में कोई ख़ास व्यक्ती आया तो सुबह के नाशते से ले कर रात के खाने तक बस खाने में व्यस्थता रहती है या उसकी तैयारी में | जैसे खाने के अलावा कोई काम न हो| जैसे सम्बन्ध स्थापित करने का केवल यही तरीका बचा हो|
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