मन, प्रभू के चरणों में: वियाना यात्रा

मुझे, वियाना के जिस कॉन्वेंट में ठहरना था वह एक पहाड़ी पर बसा है। यह बेहद खूबसूरत जगह है। यहां से वियाना शहर का काफी भाग दिखाई पड़ता है। यह एक बहुत बड़ी जगह में है। यहां से प्रकृति का नज़ारा भी सुन्दर है। उस समय पत्तियां लाल, और पीली हो रही हैं और ठंड के आते-आते अधिकतर सारे पेड़ों (क्रिसमस पेंड़ Christmas Tree को छोड़कर) गिर जाती हैं। बसन्त ऋतु के आते ही फिर निकलती हैं। पेंड़, हरे पीले और लाल रंग के हैं सुन्दर दिखते हैं। मुझे यहां शान्ति मिली और मन ईश्वर के चरणों में।

कांवेन्ट से वियाना शहर

कांवेन्ट में केवल सिस्टरें ही रहती हैं। वे अपने कॉवेन्ट के मुखिया का भी चुनाव करती हैं जिसे सिस्टर जनरल कहा जाता हे। यह छ: साल के लिये होता है। इनकी चार सलाहकार (adviser) होतीं हैं जो उन्हें सलाह देती हैं। इन्होंने विश्व को खण्डों में बांटा है। हर खण्ड का अपना मुखिया हैं वे अपने सलाहकारों के साथ आगे की योजना बनाकर कॉवेन्ट में भेजती हैं। कांवेन्ट के अनुमोदन के बाद, उस खण्ड में योजना के अनुसार काम आगे चलता है।

कॉंन्वेन्ट में कमरा

वियाना में सारे स्कूल सरकारी हैं। प्राइवेट स्कूल बहुत मंहगे हैं इसलिये यह कॉन्वेंट वहां पर कोई स्कूल नहीं चलाता है पर बहुत सी सिस्टर, स्कूलों में पढ़ाती हैं या फिर अस्पताल में या वृद्घ लोगों के आश्रम में नर्स की तरह काम करती हैं। किन्डरगार्डेन के लिये जरूर कांवेन्ट कुछ सुविधा प्रदान करती है। यहां से जो पैसे मिलते हैं वे कॉन्वेंट के पास जाते हैं जिससे वहां का खर्च वगैरह चलता है। कुछ पैसा सिस्टरों के वृद्घ उम्र के लिये रखा जाता है।

कमरे की खड़की से बाहर का दृश्य

कॉन्वेंट मेरी मुलाकात सिस्टर साइन हिल डे से हुई। वे मुझें बेहद रोचक महिला लगीं। अगली बार उन्हीं के बारे में।

वियाना यात्रा
मैं पहुंच रहा हूं।। फिल्म - सॉउन्ड ऑफ म्यूज़िक सत्य कथा पर आधारित है।। टमटम पर, राजसी ठाट-बाट के साथ, वियाना।। सिगमंड फ्रायड संग्रहालय।। मन, प्रभू के चरणों में

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इस पोस्ट में, वियाना में ठहरने की जगह के बारे में चर्चा है। यह हिन्दी (देवनागरी लिपि) में है। इसे आप रोमन या किसी और भारतीय लिपि में पढ़ सकते हैं। इसके लिये दाहिने तरफ ऊपर के विज़िट को देखें।

is post mein, vienna mein tthharne ke bare mein charchaa hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is about the place where Istayed in vienna. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


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जब एक घन्टा, एक मिनट लगता है: ई-पाती

पापा
कुछ दिन पहले हमारे यहां एक वैज्ञानिक आये थे। वे कह रह थे कि विषय पर कितनी प्रगति हुई है उससे उस विषय के महत्व का पता चलता है। उनके विचार से, कुछ विषय दूसरे विषयों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। मुझे तो वह बड़बोले लगे।

अरस्तू, ग्रीक दार्शनिक (३८४ ईसा पूर्व - ३२२ ईसा पूर्व)

उन्हें अरस्तु के दर्शन (Aristotle's philosophy) और श्यूबर्ट के संगीत (Schubert's music) का
अच्छा ज्ञान था। यदि ऐसा नहीं होता तो मैं उन्हें कूप-मंडूक ही समझती।

श्यूबर्ट, ऑस्ट्रियन संगीतकार (१३.१.१७९७ - १९.११.१८२८)

उनसे लोगों ने कुछ खास सवाल नहीं पूछे पर मुझसे नहीं रहा गया। मैंने उनसे पूछा,
'जिस विषय पर आप काम कर रहे हैं, उस पर पिछले बीस साल में कोई प्रगति नहीं हुई है तो क्या वह विषय महत्वपूर्ण नहीं है?'
उन्होने इस सवाल का जवाब नहीं दिया, बस मुस्करा कर रह गये।

मुझे आश्चर्य हुआ कि वे भाषण के बाद मेरे पास आये और बहुत देर तक मुझसे अपने भाषण के बारे में बात करते रहे। उन्हें शक था कि श्रोता, उन्हें समझ पाये कि नहीं। उन्होने मुझसे बहुत अच्छी तरह से बात की।

यह ई-मेल बहुत लम्बी हो गयी। आपको बहुत बोर किया। अब समाप्त करती हूं।

अपना और मम्मा का ख्याल रखियेगा।

बिटिया रानी
मुझे तो तुम्हारी ई-मेल बहुत छोटी लगती है। यह कुछ उसी तरह की बात है जब आइंस्टाइन (Albert Einstein) ने अपनी सेक्रेटेरी को सापेक्षिता का सिद्धान्त (Theory of Relativity) कुछ इस प्रकार से समझाया था,
'When you sit on a hot stove, you feel one minute is one hour but when you sit next to your sweetheart, you feel one hour is one minute.'
जब आप एक गर्म तवे पर बैठते हैं तब आपको एक मिनट एक घन्टा लगता है

तुम्हारी ई-मेल, प्रिय जन के पास बैठना सा है।

पर जब आप अपने प्रिय
जन के पास बैठते हैं तो एक घन्टा एक मिनट लगता है।
मुझे तो तुम्हारी ई-मेल एक प्रिय जन के पास बैठ कर बात करना सा लगता है। जितनी भी बड़ी क्यों न हो, छोटी ही लगती है। इसका हमेशा इंतजार रहता है।

१४ साल की उम्र में अलबर्ट आइंस्टाइन (१४.३.१८७९ - ८.४.१९५५)

मुझे तुम्हारी ई-मेल से कुछ बातें याद आयीं।

पहली: अपने श्रोताओं के स्तर को ध्यान में रख कर बोलो
भाषा भी हमेशा अपने श्रोताओं के स्तर की होनी चाहिये। कई वक्ता जानबूझ कर कठिन शब्दों का प्रयोग करते हैं वे सोचते हैं कि इससे उनके श्रोतागण प्रभावित होते हैं पर इसका एकदम उल्टा असर होता है। मैं इसलिये अकसर साधारण हिन्दी में बोलना पसन्द करता हूं।

अपने देश में कई वक्ता इसलिये अंग्रेजी में बोलते हैं - सोचते हैं लोग प्रभावित होंगे। श्रोता यह तो समझ सकते हैं कि वक्ता को अंग्रेजी बोलना आता है पर मुझे इसमें शक है कि क्या श्रोता, वक्ता को ठीक से समझ पाते हैं। हां, जहां लोगों को हिन्दी न समझ में आती हो वहां बात दूसरी है।

दूसरी: बोलने (लिखने) के पहले, विषय को ठीक तरह से समझो
मुझे विद्यार्थी जीवन में वी. के. कृष्णमेनन और एम. सी. सीतलवाद दोनो को कश्मीर समस्या पर सुनने का मौका मिला। कृष्णमेनन, रक्षा मंत्री और सीतलवाद महा- न्यायविद रह चुके हैं। मुझे याद नहीं कि वे, उस समय, इन पदों पर थे अथवा नहीं। कृष्णमेनन लगभग घन्टा भर बोले। वे बातों को घुमा कर, गोल गोल चक्कर में बोल रहे थे। कुछ समझ में नहीं आया कि वे क्या कहना चाहते हैं। सीतलवाद ने लगभग पन्द्रह मिनट अपनी बात पूरी की - अंग्रेजी सरल थी, समझ में आयी, किसी बात को दोहराया नहीं - कश्मीर समस्या एकदम ठीक से समझ में आयी।

यह ध्यान देने वाली बात है कि वही व्यक्ति अपनी बात सपष्ट भाषा में रख सकता है जो विषय को ठीक प्रकार से समझता हो। यदि वक्ता (लेखक) को विषय की पकड़ नहीं तो वह बस गोल-गोल चक्करों में घूमता रहेगा और समय बर्बाद करेगा।

तीसरी: लोग, अपनी कमियों को छुपाने के लिये सवाल नहीं पूछते हैं
प्रायः लोग अक्सर सवाल इसलिये नहीं पूछते हैं कि कहीं और लोग उनके सवाल पूछने के कारण उन्हें बेवकूफ न समझें। वास्तव में, बेवकूफ ही सवाल नहीं पूछते। प्रसांगिक सवाल पूछने पर वक्ता को अच्छा ही लगता है। तुम्हारे सवाल से उस वैज्ञानिक को स्पष्ट हो गया होगा कि या तो वह स्वयं महत्वहीन विषय पर काम कर रहा था या फिर गलत था। शायद उसे अपने तर्क की गलती समझ में आयी, इसीलिये उसने तुमसे बात करना पसन्द किया।

चौथी: महत्वपूर्ण, वे अनुत्तरित विषय हैं - जिसमें तुम मदद कर सको
मेरे विचार से वह वैज्ञानिक सही बात नहीं कह रहे थे। यदि आईंस्टाइन पिछली शताब्दी के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे तो रिचर्ड फाइनमेन (Richard Feynman) उसके दूसरे भाग के।

एक बार एक विद्यार्थी ने फाइनमेन को पत्र लिखा था कि वह साधारण से विषय पर काम कर कर रहा है। इस पत्र ने फाइनमेन को दुखी किया। उन्हें लगा कि उसके अध्यापक ने उसे ठीक से नहीं बताया कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं है। फाइनमेन ने उसे लिखा,
'विज्ञान में वह सवाल महत्वपूर्ण है जिसका हल अभी तक न निकला हो और जिसके हल ढ़ूढ़ने में तुम कुछ सहायता कर सकते हो।
तुम पहले छोटी छोटी और आसान सवालों का हल खोजो जो कि आसानी से मिल सकता है। तुम्हें सफलता पर आनन्द आयेगा। तुम अपने आप को इस आनन्द से मत वंचित रखो क्योंकि तुम्हें गलतफहमी है कि यह महत्वपूर्ण नहीं है।
मैंने स्वयं बहुत सारे ऐसे सवालों पर कार्य किया है जो कि साधारण थे पर मुझे उनको करने में आनन्द आया क्योंकि मैं उन पर कुछ कार्य कर सका।
तुम उस किसी भी अनुरत्तित सवाल पर काम करो चाहे वह किसी विषय का क्यों न हो जिसका हल न निकला हो और तुम उस सवाल के हल निकालने कुछ मदद कर सकते हो। कोई भी सवाल छोटा या बेकार नहीं होता यदि तुम उसका हल ढ़ूढ़ने में कुछ कर सकते हो।'
फाइनमेन की पुत्री ने उनके पत्रों को एक पुस्तक के रूप में 'Don't you have time to think' नाम से प्रकाशित किया है। इस पुस्तक की समीक्षा, मैंने कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे की फिर पर फिर उसे संकलित कर लेख चिट्ठे पर की है। तुम यदि यह कड़ी पढ़ना चाहो तो यहां या फिर पूरी समीक्षा संकलित रूप में पढ़ना चाहो तो यहां पढ़ सकती हो।

आज का दिन न केवल तुम्हारे लिये, पर हमारे लिये भी खास है। आज के दिन ही तो, एक प्यारी सी परी, इस दुनिया में आयी थी।

लिखना कि परी ने आज क्या किया, कहां गयी, या माल्टा के सपनों में खोयी रही या फिर न्यूयॉर्क की परेशानियों में।
पापा

ई-पाती
ओपेन सोर्स की पाती - बिटिया के नाम।। पापा, क्या आप उलझन में हैं।। बिटिया रानी, जैसी दुनिया चाहो, वैसा स्वयं बनो।। जब एक घन्टा, एक मिनट लगता है।।

इस चिट्ठी के चित्र विकीपीडिया से है और ग्नू स्वतंत्र अनुमति पत्र की शर्तों के अन्तर्गत प्रकाशित किये गये हैं।

यह पोस्ट नयी पीढ़ी के साथ जीवन शैली को समझने के बारे में है। यह हिन्दी (देवनागरी लिपि) में है। इसे आप रोमन या किसी और भारतीय लिपि में पढ़ सकते हैं। इसके लिये दाहिने तरफ ऊपर के विज़िट को देखें।

yah post nayee peedheer ke sath jeevan shailee samjhane ke baare men hai. yah {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part understanding life style with coming generation. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द
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