कुछ दिन पहले सुनील जी ने 'पुरुष या स्त्री ?' नाम की एक चिट्ठी पोस्ट की। उन्होने एक दूसरी चिट्ठी भी 'मैं शिव हूँ' के नाम से पोस्ट की। उसी पर संजय जी और सृजन शिल्पी जी ने टिप्पणी की। सृजन शिल्पी जी ने बाद मे 'अर्धनारीश्वर और वाणभट्ट की आत्मकथा' नाम की चिट्ठी भी पोस्ट की। मेरा मन भी था कि इन सब पर टिप्पणी करूं, फिर लगा कि एक स्वतंत्र चिट्ठी लिखना ठीक होगा। इसलिये यह चिट्ठी पोस्ट कर रहा हूं।
कुछ लोगो को प्रकृति अलग तरह से बनाती है उन्हे मस्तिष्क तो एक लिङ्ग का देती और शरीर दूसरे लिङ्ग का। इन लोगों के अपने कष्ट होते हैं सर्जरी के बढ़ते आयाम ने इन लोगों को कुछ राहत दी है। ऐसे कुछ लोग सर्जरी करा कर अपना लिङ्ग बदल सकते हैं। सेक्स परिवर्तन कराने के बाद, इन लोगों को trans-gendered कहा जाता है। इन लोगों के भी अधिकार हैं पर हमारा समाज ऐसे लोगों की पीड़ा समझना तो दूर, इनका मजाक बनाने मे भी पीछे नहीं रहता।
कुछ साल पहले की बात है कि एक टीवी बनाने वाली कम्पनी ने अपने टीवी के विज्ञापन मे एक लड़के और लड़की को एक टीवी की दुकान मे दिखाया। लड़की सुन्दर है और लड़का उससे इश्क (flirt) करने की कोशिश कर रहा है। दुकान मे अलग- अलग कम्पनी के टीवी लगे हैं। उन सब मे एक प्रोग्राम आ रहा है जिसमे एक लड़की का साक्षात्कार हो रहा है जो कि लड़के से लड़की बनी थी। लड़की का चेहरा ढ़ंका हुआ है। अलग अलग टीवी मे लड़की का चेहरा ढ़का रहता है पर जब उस कम्पनी के टीवी के सामने पहुंचते हैं तो टीवी पर लड़की का चेहरा साफ दिखायी पड़ता है। यह टीवी वाले यह बताना चाहते थे कि उनके टीवी पर तस्वीर एकदम साफ आती है। यह लड़की वही है जो कि दुकान में है। जब लड़का उसे देखता है तो घृणा से मुंह बनाते हुऐ, उस दुकान से, लड़की को छोड़ कर, चला जाता है।
मेरे विचार से यह विज्ञापन बहुत ओछा था। यदि इस विज्ञापन से जुड़े किसी व्यक्ति के परिवार मे ऐसा कोई सदस्य होता तो वह न तो यह विज्ञापन बनाता, न ही उसे अपनी कम्पनी के लिये मंजूरी देता। परिवार मे ऐसा कोई सदस्य होने की कोई जरूरत नहीं है, इसके लिये तो ऐसे लोगों की मुश्किलों को समझने की जरूरत है जो कि इस विज्ञापन को बनाने वाले या इस टीवी कम्पनी के पास नहीं थी।
संवेदनहीन (insensitive) इन्सान ही ऐसा कार्य करते हैं। मेरे विचार मे कोई भी कार्य करने से पहले उसे अपने ऊपर रख कर सोचने की जरूरत है, कि यदि वे उस जगह होते तो उन्हे कैसा लगता। मैंने इसके बारे मे कुछ लिखा-पढ़ी की और इसके पहले कुछ और कार्यवाही करता कि यह विज्ञापन दिखायी देना बन्द हो गया। कह नहीं सकता कि लिखा-पढ़ी का असर हुआ या उन्हे स्वयं लगा कि यह गलत है।
शून्य, जीरो, और बूरबाकी
कुछ समय पहले एक नयी वेब साईट शून्य नाम से इन्टरनेट पर आयी है। इस पर तकनीक और विज्ञान से जुड़े लेख और खबरें हैं जो कि पढ़ने योग्य हैं। यह न केवल हिन्दी मे है पर इसमे अंग्रेजी, बंगला, तमिल और तेलगू मे भी लेख भेजे जा सकते हैं हांलाकि अभी बंगला और तमिल मे कोई लेख नहीं आये हैं। हिन्दी मे काफी लोग ब्लौगिंग कर रहें हैं पर उन लेखों मे तकनीक और विज्ञान से जुड़े कम लेख रहते हैं, शून्य मे ऐसे लेख ज्यादा रहते हैं। शून्य, हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं के चिठ्ठे जगत मे विज्ञान और तकनीक से सम्बन्धित लेखों के लिये न केवल उत्प्रेरक का कार्य करेगी पर उन्हें नयी दिशा देगी नया रास्ता दिखायेगी, ऐसा मेरा मानना, ऐसा मेरा सोचना है ऐसी मेरी कामना है। मेरी शुभकामनाये उनके साथ हैं। इसमे सब अच्छा है केवल एक बात कुछ खटकती है।
शून्य के अनुसार यह वेब साईट है,
मुझे यह वर्णन ठीक नहीं लगता है। इसमे ज्यादातर लेख न केवल सब लोग पढ़ सकते हैं पर उन्हें पढ़ने भी चाहिये। शून्य पर लेखों के लिये शायद यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा,
शून्य को इस तरह से अपने आप को सीमित नहीं करना चाहिये। लगता है कि इसके इस वर्णन से कई लोग इस पर लिखे लेखों को पढ़ने से घबराते हैं।
मैंने भी इस वेब साईट को किसी लेख पढ़ने के लिये नहीं, पर कौतूहलवश इसके नाम के कारण से खोला था। शून्य नाम से मेरे विद्यार्थी जीवन की बहुत सारी यादे जुड़ी हुई हैं बस उसी के कारण और एक बार इस पर गया फिर इस पर लिखे या इसके द्वारा अनुमोदित लेखों को पढ़ने लगा। दो शब्द मेरी उन यादें के लिये जो शून्य के साथ जुड़ी हैं।
यह सच है कि मुझे कई बार, कई विषयों पर शून्य या सिफ़र, या जीरो नम्बर मिल चुके हैं। इसलिये इसको तो भूलना मुश्किल है। इसके अलावा और बहुत सी यादें हैं
मैं जब विद्यार्थी था या जैसे ही विद्यार्थी जीवन समाप्त किया तब ही एक पिक्चर 'पूरब और पश्चिम' आयी थी। इसमे मनोज कुमार, सायरा बानो, और प्राण थे। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार कि है कि सायरा बानो, प्राण की लड़की का किरदार निभा रहीं हैं और लंदन मे अपने पिता के साथ रहती हैं। मनोज कुमार इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लंदन पढ़ने जाते हैं। वहां एक जगह, शायद इंडिया हाऊस मे, उनकी मुलाकात प्राण से होती है। प्राण उनसे कहते हैं कि हिन्दुस्थान तो जीरो है इस पर वह, जीरो का महत्व के लिये यह कहते हैं यह लय मे एक गाने के छोटे से हिस्से के रूप मे है।
यह गाना कुछ लम्बा है पर मैने इसका जीरो से सम्बन्धित भाग ही लिखा है। इस गाने को आप यहां सुन सकते हैं और यहां विडियो में देख और सुन सकते हैं।। यदि आपने पहले इसे सुना है तो आपको यह पुरानी यादों मे वापस ले जायेगा। यदि नहीं सुना है तो कम से कम एक बार सुनिये - आपको अच्छा लगेगा।
मैंने पहले इस गाने को ogg फॉरमैट में रखा था पर अब सीधे लिंक दे दिया है। यहां मैं आपको बताना चाहूंगा कि ogg फॉरमैट की ऑडियो फाइलों को आप हर ऑपरेटिंग सिस्टम मे सुन सकते हैं पर आप इसे किस प्रोग्राम मे सुन पायेंगे इसके लिये यहां देखें। इसे विन्डोस़ मे विन्डो मीडिया प्लेयर पर भी सुन सकते हैं। vorbis.com के अनुसार विन्डो मीडिया प्लेयर-१० या उसके उपर का प्रोग्राम प्रयोग करना पड़ेगा पर इसमे भी मुश्किल पड़ती है। विन्डोस़ मे ogg फॉरमैट पर म्यूज़िक सुनने के लिये एक प्रोग्राम विनऐम्प है। यह एकदम फ्री प्रोग्राम है और यहां से डाऊनलोड किया जा सकता है। ऑडेसिटी (Audacity) एक और प्रोग्राम है जिसमे इसे सुना जा सकता है। ऑडेसिटी का फायदा यह है कि यह ओपेन सोर्स है और विन्डोस, लिनेक्स, तथा ऐपेल्ल तीनो पर चलता है। विनऐम्प और ऑडेसिटी बहुत अच्छे प्रोग्राम हैं और इन पर हर फॉरमैट की ऑडियो क्लिप सुनी जा सकती है। इन्हे प्रयोग कीजिये। यहां कुछ शब्द ogg फॉरमैट के बारे मे।
मैं कई चिठ्ठेकार बन्धुवों की ऑडियो क्लिप सुनता हूं। यह सब MP-3 फॉरमैट मे होती हैं। MP-3 फॉरमैट मलिकाना है। जब कि ogg फॉरमैट ओपेन सोर्स है और इस पर किसी का कोई मलिकाना अधिकार नहीं है। इसके बारे मे विस्तृत जानकारी यहां देखें। इस बारे मे भी सोचियेगा कि,
१९३० के दशक मे नीकोला बूरबाकी (Nicolas Bourbaki) के नाम से गणित पर बहुत सारी फ्रांसीसी किताबें आयीं। इन किताबों ने गणित को नयी दिशा दी। नीकोला बूरबाकी नाम का कोई भी व्यक्ति नहीं था। कुछ फ्रांसीसी गणितज्ञों ने मिल कर यह कार्य किया। किताबों मे लेखक का नाम देना जरूरी होता है चार्ल्स डेनिस बूरबाकी फ्रांसीसी सेना के एक प्रसिद्ध अधिकारी थे। फ्रांसीसी गणितज्ञों ने, बस उसी के नाम पर एक काल्पनिक नाम नीकोला बूरबाकी चुन लिया और लगे लिखने गणित पर किताबें। किताबें इतनी अच्छी थीं कि उसने गणित को नयी दिशा ही दे दी। न ही उसमे किसी ने अपने नाम के बारे मे सोचा, न ही किसी ने कॉपीराईट के बारे मे - गणित को आगे बढ़ाना ही उनका ध्येय था। बूरबाकी के बारे मे एक अच्छा लेख साईंटिफिक अमेरिकन के मई १९५७ के अंक मे छपा है। इस लेख को पौल हेलमौस ने लिखा है जो कि स्वयं एक जाने माने गणितज्ञ हैं। नीचे के दो स्केच साईंटिफिक अमेरिकन के सौजन्य से हैं और इस पत्रिका के इसी लेख के साथ मई १९५७ के अंक मे छपे थे। स्केच के नीचे जैसा साईंटिफिक अमेरिकन मे अंग्रेजी मे लिखा है वही यहां पर मैने लिख दिया है।
NICOLASA BOURBAKI is fancifully reprresented by this milling throng of French mathematicians. Bourbaki appears to consist of 10 to 20 men at any one time. Any resemblence between these men and the individuals in the drawing is entirely coincidental
GENERAL BOURBAKI, whose name was not Nicolas but Charles Denis Sauter, is depicted in this drawing based on an engraving. He was once offered the crown of Greece.
१९६० के दशक मे मैंने स्नातक कि कक्षा मे प्रवेश लिया। स्नातक कक्षा मे गणित भी मेरा एक विषय था। उस समय गणित के कुछ अध्यापकों और विद्यार्थियों ने इसी बूरबाकी से प्रेणना लेकर जीरो नाम का क्लब बनाया और कई कार्यकर्म किये और कुछ किताबें भी लिखीं।
शून्य ने मुझे कुछ इन्ही बातों की याद दिलायी जिसके कारण मैने इस वेब साईट को देखा। यह हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के चिठ्ठों को नयी दिशा देगी - इसी शुभकामना के साथ यह चिठ्ठी समाप्त करता हूं और ज्लदी ही फिर से बात करने उपस्थित होऊंगा।
१ मै नहीं जानता कि यह उच्चारण सही है कि नहीं क्या कोई इसकी पुष्टि करेगा
शून्य के अनुसार यह वेब साईट है,
तकनीकी लोगों के लिये, तकनीकी लोगों के द्वारा (News for Techies in India. By techies in India)
तकनीकी लोगों के द्वारा, सबके लिये और सब के द्वारा, तकनीकी लोगों के लिये
मैंने भी इस वेब साईट को किसी लेख पढ़ने के लिये नहीं, पर कौतूहलवश इसके नाम के कारण से खोला था। शून्य नाम से मेरे विद्यार्थी जीवन की बहुत सारी यादे जुड़ी हुई हैं बस उसी के कारण और एक बार इस पर गया फिर इस पर लिखे या इसके द्वारा अनुमोदित लेखों को पढ़ने लगा। दो शब्द मेरी उन यादें के लिये जो शून्य के साथ जुड़ी हैं।
यह सच है कि मुझे कई बार, कई विषयों पर शून्य या सिफ़र, या जीरो नम्बर मिल चुके हैं। इसलिये इसको तो भूलना मुश्किल है। इसके अलावा और बहुत सी यादें हैं
मैं जब विद्यार्थी था या जैसे ही विद्यार्थी जीवन समाप्त किया तब ही एक पिक्चर 'पूरब और पश्चिम' आयी थी। इसमे मनोज कुमार, सायरा बानो, और प्राण थे। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार कि है कि सायरा बानो, प्राण की लड़की का किरदार निभा रहीं हैं और लंदन मे अपने पिता के साथ रहती हैं। मनोज कुमार इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लंदन पढ़ने जाते हैं। वहां एक जगह, शायद इंडिया हाऊस मे, उनकी मुलाकात प्राण से होती है। प्राण उनसे कहते हैं कि हिन्दुस्थान तो जीरो है इस पर वह, जीरो का महत्व के लिये यह कहते हैं यह लय मे एक गाने के छोटे से हिस्से के रूप मे है।
जब जीरो दिया मेरे भारत ने,
भारत ने, मेरे भारत ने,
दुनिया को तब गिनती आयी।
तारों की भाषा भारत ने,
दुनिया को पहले सिखलायी।
देता न दशमलव भारत तो,
यूं चांद पर जाना मुश्किल था।
धरती और चांद की दूरी का,
अन्दाजा लगाना मुश्किल था।
सभ्यता जहां पहले आयी,
सभ्यता जहां पहले आयी।
पहले जन्मी है, जहां पे कला।
अपना भारत, वह भारत है,
जिसके पीछे संसार चला।
संसार चला, और आगे बढ़ा।
यूं आगे बढ़ा, बढ़ता ही गया।
भगवान करे यह और बढ़े,
बढ़ता ही रहे और फूले फले।
बढ़ता ही रहे और फूले फले।
यह गाना कुछ लम्बा है पर मैने इसका जीरो से सम्बन्धित भाग ही लिखा है। इस गाने को आप यहां सुन सकते हैं और यहां विडियो में देख और सुन सकते हैं।। यदि आपने पहले इसे सुना है तो आपको यह पुरानी यादों मे वापस ले जायेगा। यदि नहीं सुना है तो कम से कम एक बार सुनिये - आपको अच्छा लगेगा।
मैंने पहले इस गाने को ogg फॉरमैट में रखा था पर अब सीधे लिंक दे दिया है। यहां मैं आपको बताना चाहूंगा कि ogg फॉरमैट की ऑडियो फाइलों को आप हर ऑपरेटिंग सिस्टम मे सुन सकते हैं पर आप इसे किस प्रोग्राम मे सुन पायेंगे इसके लिये यहां देखें। इसे विन्डोस़ मे विन्डो मीडिया प्लेयर पर भी सुन सकते हैं। vorbis.com के अनुसार विन्डो मीडिया प्लेयर-१० या उसके उपर का प्रोग्राम प्रयोग करना पड़ेगा पर इसमे भी मुश्किल पड़ती है। विन्डोस़ मे ogg फॉरमैट पर म्यूज़िक सुनने के लिये एक प्रोग्राम विनऐम्प है। यह एकदम फ्री प्रोग्राम है और यहां से डाऊनलोड किया जा सकता है। ऑडेसिटी (Audacity) एक और प्रोग्राम है जिसमे इसे सुना जा सकता है। ऑडेसिटी का फायदा यह है कि यह ओपेन सोर्स है और विन्डोस, लिनेक्स, तथा ऐपेल्ल तीनो पर चलता है। विनऐम्प और ऑडेसिटी बहुत अच्छे प्रोग्राम हैं और इन पर हर फॉरमैट की ऑडियो क्लिप सुनी जा सकती है। इन्हे प्रयोग कीजिये। यहां कुछ शब्द ogg फॉरमैट के बारे मे।
मैं कई चिठ्ठेकार बन्धुवों की ऑडियो क्लिप सुनता हूं। यह सब MP-3 फॉरमैट मे होती हैं। MP-3 फॉरमैट मलिकाना है। जब कि ogg फॉरमैट ओपेन सोर्स है और इस पर किसी का कोई मलिकाना अधिकार नहीं है। इसके बारे मे विस्तृत जानकारी यहां देखें। इस बारे मे भी सोचियेगा कि,
- मलिकाना फॉरमैट का क्यों प्रयोग किया जाय?
- क्यों नहीं ऐसी फॉरमैट का प्रयोग किया जाय जो कि ओपेन सोर्स हो?
- क्या थोड़ी सी सुविधा के लिये अपने अधिकारों को सीमित करना ठीक होगा?
१९३० के दशक मे नीकोला बूरबाकी (Nicolas Bourbaki) के नाम से गणित पर बहुत सारी फ्रांसीसी किताबें आयीं। इन किताबों ने गणित को नयी दिशा दी। नीकोला बूरबाकी नाम का कोई भी व्यक्ति नहीं था। कुछ फ्रांसीसी गणितज्ञों ने मिल कर यह कार्य किया। किताबों मे लेखक का नाम देना जरूरी होता है चार्ल्स डेनिस बूरबाकी फ्रांसीसी सेना के एक प्रसिद्ध अधिकारी थे। फ्रांसीसी गणितज्ञों ने, बस उसी के नाम पर एक काल्पनिक नाम नीकोला बूरबाकी चुन लिया और लगे लिखने गणित पर किताबें। किताबें इतनी अच्छी थीं कि उसने गणित को नयी दिशा ही दे दी। न ही उसमे किसी ने अपने नाम के बारे मे सोचा, न ही किसी ने कॉपीराईट के बारे मे - गणित को आगे बढ़ाना ही उनका ध्येय था। बूरबाकी के बारे मे एक अच्छा लेख साईंटिफिक अमेरिकन के मई १९५७ के अंक मे छपा है। इस लेख को पौल हेलमौस ने लिखा है जो कि स्वयं एक जाने माने गणितज्ञ हैं। नीचे के दो स्केच साईंटिफिक अमेरिकन के सौजन्य से हैं और इस पत्रिका के इसी लेख के साथ मई १९५७ के अंक मे छपे थे। स्केच के नीचे जैसा साईंटिफिक अमेरिकन मे अंग्रेजी मे लिखा है वही यहां पर मैने लिख दिया है।
NICOLASA BOURBAKI is fancifully reprresented by this milling throng of French mathematicians. Bourbaki appears to consist of 10 to 20 men at any one time. Any resemblence between these men and the individuals in the drawing is entirely coincidental
GENERAL BOURBAKI, whose name was not Nicolas but Charles Denis Sauter, is depicted in this drawing based on an engraving. He was once offered the crown of Greece.१९६० के दशक मे मैंने स्नातक कि कक्षा मे प्रवेश लिया। स्नातक कक्षा मे गणित भी मेरा एक विषय था। उस समय गणित के कुछ अध्यापकों और विद्यार्थियों ने इसी बूरबाकी से प्रेणना लेकर जीरो नाम का क्लब बनाया और कई कार्यकर्म किये और कुछ किताबें भी लिखीं।
शून्य ने मुझे कुछ इन्ही बातों की याद दिलायी जिसके कारण मैने इस वेब साईट को देखा। यह हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के चिठ्ठों को नयी दिशा देगी - इसी शुभकामना के साथ यह चिठ्ठी समाप्त करता हूं और ज्लदी ही फिर से बात करने उपस्थित होऊंगा।
१ मै नहीं जानता कि यह उच्चारण सही है कि नहीं क्या कोई इसकी पुष्टि करेगा
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