१.६ पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
तीसरी पोस्ट: इतिहास की दृष्टि में
चौथी पोस्ट: पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण
पांचवीं पोस्ट: आविष्कार
यह पोस्ट: पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व
यदि आप, इस चिट्ठी को पढ़ने के बजाय, सुनना पसन्द करें तो इसे मेरी 'बकबक' पर यहां क्लिक करके सुन सकते हैं। यह ऑडियो क्लिप, ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं।

मैने इसे ogg फॉरमैट क्यों रखा है यह जानने के लिये आप मेरी शून्य, जीरो, और बूरबाकी की चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। अब चलते हैं इस चिट्ठी पर।

पेटेंट एक सम्पत्ति है जो कि, विरासत में प्राप्त की जा सकती है । पेटेंटी उसे किसी और को दे (assign) सकता है या बन्धक रख सकता है। यदि दूसरे लोगों ने यदि पेटें‍टी से लाइसेंस न लिया हो तो, पेटेंटी उन्हें अपने पेटेंट का प्रयोग करने से या उसका विक्रय करने से रोक सकता है। उसे अधिकार है कि वह लाइसेंस के द्वारा दूसरे लोगों को यह कार्य करने के लिये अनुमति दे और इसके लिये वह रायल्टी भी ले सकता है। यदि कोई व्यक्ति, पेटेंटी से बिना लाइसेंस लिए या उसके पेटेंट का अनाधिकृत प्रयोग करता है तो पेटेंटी उस पर हर्जाने का मुकदमा या injunction का मुकदमा दायर कर उचित अनुतोष प्राप्त कर सकता है। ट्रिप्स, ट्रेड मार्क या कॉपीराईट के उल्लंघन के मामलों में दाण्डिक प्रक्रियाओं एवं शास्तियों का प्रावधान बनाने के लिए सदस्यों को कहता है लेकिन पेटेंट के उल्लंघन के लिए नहीं। हमने भी पेटेंट का उल्लंघन करने वाले के लिये दाण्डिक अभियोजन का उपबन्ध नहीं किया है। हां झूठ बोलकर पेटेंट प्राप्त करने पर दाण्डिक अभियोजन की बात अवश्य है।

मेरा प्रयत्न रहेगा कि इस सिरीस की चिट्ठियां और इनकी ऑडियो क्लिपें, भारतीय समय के अनुसार हर बृहस्पतिवार की रात्रि को पोस्ट होंं। इस पोस्ट के साथ पेटेंट सिरीस का भाग-१ समाप्त होता है अब हम एक बृहस्पतिवार को छोड़ कर फिर मिलेंगे ३१ अगस्त को तब चर्चा शुरु करेंगे इस सिरीस के भाग-२ की। इस भाग का शीर्षक है - पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम।

अन्य चिट्ठों पर क्या नया है इसे आप दाहिने तरफ साईड बार में, या नीचे देख सकते हैं।

हरिवंश राय बच्चन - विवाद

कुछ समय पहले हिन्दी चिट्ठे जगत में इस बात की चर्चा रही कि किसी को लिखी गयी व्यक्तिगत ईमेल बिना लिखने वाले की अनुमति के सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करना उचित है कि नहीं - इसके लिये यहां, यहां, और यहां देखें। इस विषय पर अनूप शुक्ला जी की चिट्ठी पर मैंने टिप्पणी की थी कि
'किसी कि private ई-मेल या पत्र, लेखक का कौपी-राईट है और बिना लिखने वाले की अनुमति के प्रकाशित करना अनुचित है। जहां तक मुझे याद पड़ता है कि हरिवंश राय बच्चन और एक अन्य साहित्यकार के बीच इस बारे मे काफी विवाद हो चुका है।'


मुझे उस समय दूसरे साहित्यकार का नाम याद नहीं आ रहा था इसलिये नहीं लिखा था। कुछ दिन पहले हवाई अड्डे पर अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी दिख गये। मैं भी उन कड़ोड़ो लोगों मे हूं जो कि उनके दिवाने हैं। मैं उनसे बात करने का यह सुनहरा मौका नहीं छोड़ने वाला था - बस लस लिया उनके साथ। अब यदि आप विख्यात हों तो मेरे जैसे कईयों को तो झेलना पड़ेगा ही - विख्यात होने का कुछ न कुछ तो मूल्य चुकाना होगा। जब मैनें उनसे पत्र लिखने के विवाद के बारे में पूछा तब उन्होने बताया कि यह सुमित्रा नन्दन पन्त के साथ हुआ था। उन्होने कहा,
'यह बाबूजी कि आत्मकथा में मिलेगा। उनकी चौथी किताब भी आ गयी है।'

मैंने इन लोगों से कोई ३-४ मिनट बात की होगी - बहुत अच्छी तरह से बात की
। पर एक बात का दुख रहा। उन दोनो का प्रयत्न था कि वे अंग्रेजी में बात करें। वहां स्टाफ से भी उन्होने अंग्रजी में बात की। मैने इस बारे मे अपनी शुरू की चिट्ठी में यहां लिखा था, आज देख भी लिया। ऐसी जगहों पर मेरा हमेशा प्रयत्न रहता है कि मैं हिन्दी में बात करूं - चलिये हर को अपना अन्दाज मुबारक।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खन्डो में लिखी है। यह हैं,
  • क्या भूलूं क्या याद करूं
  • नीड़ का निर्माण
  • बसेरे से दूर
  • दशद्वार से सोपान तक
मैने वापस आ कर चारो खन्ड खरीद लिये हैं। आने वाली चिट्ठियों में कुछ इन किताबों के बारे में और कुछ उस विवाद के बारे में।
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