आंकड़े गलत बताते हैं

मैंने, 'यौन शिक्षा और सांख्यिकी' की चिट्ठी पर, सांख्यिकी से जुड़े ४० वर्ष पहले विद्यार्थी जीवन के अनुभव, और उस समय सांख्यिकी पर पढ़ी कुछ बेहतरीन पुस्तकों (जो आज भी सांख्यिकी की लाजवाब पुस्तकें मानी जाती हैं) के बारे में बात करने को कहा था। चलिये चलते हैं इस सफर पर भी।

मैं कागज, पेन्सिल से ठीक ठाक काम कर लेता था पर हाथ से काम करने में हमेशा फिसड्डी - हमेशा सैद्धान्तिक विज्ञान ही पसन्द आया और विज्ञान की प्रयोग-कक्षा (practical class प्रैक्टिकल क्लास) में नानी याद आती थी। रसायन शास्त्र के अनुमापन (titration टाइट्रेशन) के प्रैक्टिकल तो जैसे तैसे समाप्त किये - कब रंग गुलाबी हुआ, कब रोका जाय, हो ही नहीं पाता था। विद्यार्थी जीवन में पहला मौका मिलते ही रसायन शास्त्र छोड़ कर सांख्यिकी विषय ले लिया - यह कोई १९६० दशक के बीच की बात होगी।

हमारे सांख्यिकी अध्यापक हमेशा सूट में आते थे - ऐंठ रहती थी। लड़कियों पर प्रभाव डालने के प्रयत्न में रहते थे। अंग्रेजी बहुत स्टाईल से बोलते थे। हालांकि उनका उच्चारण एकदम सही नहीं था। विषय पर पकड़ भी अच्छी नहीं थी। अच्छा ही हुआ कि वे बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चले गये।

सांख्यिकी अथार्त आंकड़ों को एकत्र करना और उनका विश्लेषण कर - परिणाम निकालना, सवालों के उत्तर ढ़ूढना, और कल्पना को रूप देना और है। यह आसान विषय नहीं है, स्पष्ट नहीं होता था। इसलिये, हर किसी के लिये, इसके द्वारा निकाले गये परिणामों में गलती पकड़ पाना कठिन है। शायद, इसी लिये यह कहावत शुरू हूई कि,
'There are lies, damned lies and Statistics'
आंकड़े गलत बताते हैं।
मैंने सांख्यिकी के बारे में कोर्स से हट कर पुस्तकें ढूढ़नी शुरू की। सबसे पहले Facts from Figures by M.J.Moroney की पुस्तक मिली। इसे पढ़ने बाद ही यह विषय ठीक से समझ में आया। यह अच्छी पुस्तक है। यह इस विषय पर सम्पूर्ण तो नहीं है पर यह पाठकों को सांख्यिकी की मुख्य बातों को अच्छी तरह से बताती है और इसके सिद्घान्तों को अच्छी तरह से समझाती है।

इसके साथ मैंने दो और पुस्तकें पढ़ी। यह दोनों पुस्तकें Darrell Huff ने लिखी हैं। एक है How to lie with Statistics और दूसरी है How to take a chance. यह भी सांख्यिकी और Probability (संभावनाओं) के सिद्घान्तों को अच्छी तरह से समझाती है। मुझे दोनो पुस्तकें भी पसन्द आयी।

यदि आपका सांख्यिकी में कुछ भी सम्बन्ध है, या आपके मुन्ने या मुन्नी इस विषय पर रूचि रखते हैं, या इस विषय को पढ़ रहे हों तो इसे पढ़ने को दें। यह तीनों पुस्तकें इस समय Pelican में उपलब्ध हैं।

मेरे विद्यार्थी जीवन में गणित और सांख्यिकी दोनों विषयों में Probability का पेपर हुआ करता था। हम लोगों को इसका फायदा मिला - एक पेपर कम पढ़ना पड़ा।

हम संभावनाओं की गणित को कुछ इस प्रकार समझा सकते है कि यदि आप किसी सिक्के को उछालें तो या हैड आयेगा या टेल। यानी कि दो संभावनायें हैं। यदि 'शकुनि सिक्का' न हो तो दोनों में से कोई एक आ सकता है। इसलिये कहा जाता है कि हैड या टेल के आने की संभावना १/२ यानी कि आधी है।

संभावनाओं की गणित का विषय मुश्किल है। हम लोग कहा करते थे कि यदि सवाल का जवाब मालुम हो वह तर्क निकाल सकते हैं जिसके द्वारा वह जवाब मिल सके। How to take a chance इस विषय को अच्छी तरह से समझाती है। इसको पढ़ने के बाद ही इस विषय पर पकड़ आयी।

इसी बात पर एक सवाल।

लड़का होगा या लड़की, इसकी संभावना भी हैड या टेल की तरह आधी होती है। सवाल यह है कि यदि किसी दम्पत्ति के दो बच्चे हों और उनमें से एक लड़की हो तो इस बात की क्या सम्भावना है कि दूसरा बच्चा भी लड़की होगा।

यदि आप संभावनाओं के सिद्घान्तों को अच्छी तरह से समझतें है तो यह सवाल एकदम आसान, यदि नहीं तो फिर मुश्किल है। कोशिश कर के देखिये।

इस सवाल का जवाब यहां में देखें।

सांकेतिक शब्द
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अलविदा कश्मीर

मैं, १९७५ की जून में एक महीने श्रीनगर रहा था। जिस घर में ठहरा था उसके बगल में पहाड़ी है उसके ऊपर शिवजी का मंदिर है। यह शंकराचार्य जी का मंदिर कहलाता है क्योंकि उन्होंने ही शिवलिंग की स्थापना की थी मैं तब कई बार पैदल उस मंदिर तक गया था। उस समय मंदिर में केवल हमी लोग होते थे। अब पक्की रोड बन गयी है और अन्त में २४० सीढ़ियां है। पहाड़ी रास्ते से जाने की इजाजत नहीं है। सब तरफ पुलिस का पहरा है। आप मंदिर तक कैमरा भी नहीं ले जा सकते हैं। इस मंदिर में 'आपकी कसम' फिल्म के गाने 'जय-जय शिवशंकर' के आधे भाग की शूटिंग हुयी है। इस बार जब हम लोग मंदिर पहुंचे तब वहां सैकड़ों लोग थे। बहुत भीड़ थी।

कश्मीर के हरियाली और फूल श्रीनगर में जगह-जगह बाग हैं मुगल राज्य के समय के दो बाग निषाद और शालीमार अब भी पुराने समय की दास्तान बिखेर रहे हैं।

निषाद बाग से हजरतबल मस्जिद दिखायी पड़ती है जिसमें कुछ साल पहले उग्रवादी घुस गये थे और मुश्किल से निकाले जा सके।

श्रीनगर में चश्मेशाही है। यहां पानी निकलता है। कहा जाता है कि इसमें औषधीय तत्व हैंः पीने से पीलिया तथा पेट की बीमारी दूर हो जाती है। मेरा पेट कुछ खराब चल रहता है। मैंने पानी पिया। यह मनोवैज्ञानिक कारण था या वास्तविक पर मेरे दस्त ठीक हो गये। कहा जाता है कि जवाहरलाल नेहरू के पीने के लिये पानी यहां से जाता था।

श्रीनगर में परी महल भी है इसे शाहजहां के लड़के दाराशिकोह ने सूफी संतों के रहने और अध्ययन के लिये बनवाया था। कहा जाता है कि इसका नाम पीर महल था सरकार ने इसका नाम परी महल कर दिया है। सरकार के मुताबिक परियां पवित्र जगह जाती हैं, यहां पवित्र आत्मायें रहती थीं - इसलिये इसका नाम परी महल रख दिया गया।

मालुम नहीं, क्या सच है - इस समय तो इसमें न सूफी सन्त रहते हैं न ही परियां - इसमें पैरा मिलिट्री वालों ने कब्जा जमा लिया है।

श्रीनगर में एक नया १८ होल का अन्तरराष्ट्रीय गोल्फ कोर्स बना है परी महल से पूरा दिखायी पड़ता है। यह बहुत सुन्दर है।



कश्मीर में सबसे अच्छी बात यह लगी कि बहुत कम महिलायें बुरका पहने दिखायी पड़ीं। मैं केरल और हैदराबाद भी जाता रहता हूं। वहां पर ज्यादा महिलायें बुरका पहने दिखायी पड़ीं बनिस्बत कश्मीर के। महिलायें व लड़कियां सर पर स्कार्फ लगाये, स्मार्ट और सुन्दर लगती हैं; देखने में भी अच्छा लगता है। काला बुरका जैसे सुन्दरता पर जैसे कालिख पोत दी हो।

जितनी अस्तव्यस्तता, श्रीनगर हवाई अड्डे पर है उतनी शायद कहीं नहीं। वहां पर कोई भी स्क्रीन नहीं है जो यह बताये कि आपकी उड़ान सही समय से है या लेट है या उसकी बोर्डिंग शुरू हो गयी है। इसमें टी.वी. है उसमें अलग चैनल आवाज के साथ चल रहा है। शोर इतना कि कोई भी प्रसारण में क्या कहा जा रहा है पता नहीं चलता। सुरक्षा जांच जगह-जगह पर है। मैं यही समझता था कि यहां सारा काम बहुत तरीके से होगा, पर यहां तो सब उलटा ही है।

मुझे कश्मीर में शान्ति लगी। यह उतनी ही है जितना भारत के किसी अन्य जगह। जनता आम नेताओं, मीडिया, और पैरा मिलिट्री फोर्स से दुखी लगी। उनके मुताबिक, जितनी अशान्ति उग्रवादी फैलाते हैं उतनी ही नेता और पैरा मिलिट्री फोर्स के लोग। उनके अनुसार इसमें मीडिया की भी भागीदारी है।

वहां के लोगों के अनुसार, एक नेता दूसरे नेता को नीचा दिखाने के लिये उग्रवादी गतिविधियां करा देता है; पैरा मिलिट्री फोर्स को वहां सर्च करने में ज्यादा पैसा मिलता है इसलिये वहां से कब्जा छोड़ना नहीं चाहती; मीडिया भी वहां छोटी-छोटी घटनाओं को ज्यादा विस्तार से दिखा रहा है जिसके कारण लोगों को कश्मीर के बारे में गलतफहमी हो जाती है।

मैं नहीं कह सकता कि आम लोगों का यह सोचना ठीक है या फिर पैरा मिलिट्री फोर्स के लोगों का, या फिर मीडिया का, पर मैं पुनः कश्मीर जाना चाहूंगा, यह बेहद सुन्दर जगह है और लोग भी अच्छे हैं। तब तक के लिये - अलविदा कश्मीर।

देखते हैं कि मैंं अगली बार आपको कहां ले चलता हूं।

कश्मीर यात्रा
जन्नत कहीं है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।। बम्बई का फैशन और कश्मीर का मौसम – दोनो का कोई ठिकाना नहीं है।। मिथुन चक्रवर्ती ने अपने चौकीदार को क्यों निकाल दिया।। आप स्विटज़रलैण्ड में हैं।। हम तुम एक कमरे में बन्द हों।। Everything you desire – Five Point Someone।। गुलमर्ग में तारगाड़ी।। हेलगा कैटरीना और लीनुक्स।। डल झील पर जीवन।। न्यायपालिका और पर्यावरण।। अलविदा कश्मीर।।
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